Crude Oil : पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ते तनाव और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव ने भारत की सार्वजनिक तेल कंपनियों की कमर तोड़ दी है. एक रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन ऑयल (IOC), बीपीसीएल (BPCL) और एचपीसीएल (HPCL) को मार्च के मध्य से अब तक लगभग 30,000 करोड़ रुपये का घाटा झेलना पड़ा है.
क्यों हुआ इतना बड़ा नुकसान ?
इस भारी नुकसान के पीछे मुख्य कारण कच्चे माल (कच्चा तेल) की लागत में भारी बढ़ोतरी और घरेलू कीमतों का स्थिर रहना है.
- कच्चे तेल के दाम में उछाल: संघर्ष शुरू होने से पहले ब्रेंट क्रूड करीब 72 डॉलर प्रति बैरल था, जो तनाव के कारण एक समय 144 डॉलर तक पहुंच गया था. अब यह 100 डॉलर के आसपास है.
- कीमतें नहीं बढ़ीं: कच्चे तेल की लागत 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ने के बावजूद, भारत में 28 फरवरी के बाद से पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया.
- प्रति लीटर घाटा: अप्रैल के दौरान तेल कंपनियों को पेट्रोल पर करीब 18 रुपये और डीजल पर 25 रुपये प्रति लीटर का नुकसान उठाना पड़ रहा था.
सरकार ने दी थोड़ी राहत
अगर केंद्र सरकार ने दखल न दिया होता, तो यह नुकसान और भी भयावह हो सकता था. सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क (Excise Duty) में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती करने से कंपनियों को कुछ सहारा मिला. यदि यह कटौती नहीं होती, तो तेल कंपनियों का कुल घाटा 62,500 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता था.
आपूर्ति पर नहीं पड़ा असर
इतने बड़े वित्तीय दबाव और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के रास्ते सप्लाई में अनिश्चितता के बावजूद, तेल कंपनियों ने देश में ईंधन की कमी नहीं होने दी. देशभर में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी (LPG) की सप्लाई सामान्य बनी रही. इसके अलावा, आपातकालीन कच्चे तेल की खरीद, महंगा बीमा प्रीमियम और परिवहन लागत बढ़ने से भी कंपनियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है.
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