Crisil Report : देश में पेट्रोल-डीजल की महंगाई और रुपये की ऐतिहासिक कमजोरी के बीच अब भारतीय अर्थव्यवस्था के बाहरी संतुलन (External Balance) को लेकर एक बड़ी चेतावनी सामने आई है. मशहूर रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (Crisil) ने मंगलवार 19 मई को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में भारत का तेल व्यापार घाटा (Oil Trade Deficit) बहुत तेजी से बढ़ने वाला है. रिपोर्ट के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, भारत से होने वाले पेट्रोलियम एक्सपोर्ट (निर्यात) में कमी और विदेशी तेल पर हमारी भारी निर्भरता मिलकर देश की आर्थिक सेहत को बिगाड़ रहे हैं.
85% निर्भरता: भारत की सबसे बड़ी कमजोरी
क्रिसिल ने अपनी रिपोर्ट में साफ रेखांकित किया है कि भारत अपनी सालाना जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात (Import) करता है. यही वजह है कि जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में जरा सी हलचल होती है, हमारा पूरा बजट डगमगा जाता है.
वित्त वर्ष 2013-14 (FY14): भारत करीब 190 मिलियन टन कच्चे तेल का आयात करता था.
वित्त वर्ष 2025-26 (FY26): यह आयात बढ़कर 300 मिलियन टन के पार पहुंच चुका है.
क्यों टूट रहा है पुराना ट्रेंड?
आमतौर पर आर्थिक नियम कहता है कि जब कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं, तो भारत का व्यापार घाटा कम होता है. लेकिन इस बार यह ट्रेंड टूट गया है:
- घट रहा है रिफाइंड ऑयल का एक्सपोर्ट: भारत विदेशों से कच्चा तेल मंगाकर उसे रिफाइंड करता है और फिर पेट्रोल-डीजल-एटीएफ के रूप में दूसरे देशों को बेचता है (एक्सपोर्ट करता है). कोविड-19 के बाद एक समय इसमें उछाल आया था, लेकिन वित्त वर्ष 2023-24 (FY24) से लगातार दो सालों से भारत का पेट्रोलियम एक्सपोर्ट घट रहा है.
- एक तरफ हमारा कच्चा तेल मंगाने का खर्च (इंपोर्ट) लगातार बढ़ रहा है, और दूसरी तरफ तैयार तेल बेचने की कमाई (एक्सपोर्ट) घट रही है. इसी वजह से डॉलर के टर्म में हमारा तेल व्यापार घाटा लगातार चौड़ा हो रहा है.
चालू खाता घाटा (CAD) 2.2% होने का अनुमान
क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष (FY27) में हालात और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं.
- कच्चा तेल $95 के पार जाने की आशंका: पिछले वित्त वर्ष में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत 70.3 डॉलर प्रति बैरल थी. लेकिन क्रिसिल का अनुमान है कि इस वित्त वर्ष (FY27) में कच्चे तेल की औसत कीमत 90 से 95 डॉलर प्रति बैरल के बीच रह सकती है (मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव को देखते हुए यह $110 के आसपास भी मंडरा रहा है).
- खाड़ी देशों से आने वाले पैसे (Remittances) पर दबाव: अमेरिका-ईरान और मिडिल ईस्ट के तनाव के कारण खाड़ी देशों में काम करने वाले भारतीयों द्वारा घर भेजे जाने वाले पैसे (Remittances) पर भी बुरा असर पड़ सकता है. करेंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) में उछाल: इन तमाम कारणों के चलते क्रिसिल ने अनुमान लगाया है कि भारत का चालू खाता घाटा (CAD) पिछले वित्त वर्ष के 0.8% से तीन गुना बढ़कर इस साल जीडीपी का 2.2 प्रतिशत हो सकता है.
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