CITI Report : भारतीय कपड़ा और परिधान क्षेत्र (Textile and Apparel Sector) के लिए आने वाला समय चुनौतियों भरा हो सकता है. Confederation of Indian Textile Industry (CITI) द्वारा गुरुवार को जारी एक ऐतिहासिक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि कपास (Cotton) पर लगा 11% आयात शुल्क भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धा क्षमता को खत्म कर रहा है.
संकट के मुख्य बिंदु
रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने 2030 तक इस सेक्टर के लिए 350 अरब डॉलर का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, लेकिन वर्तमान नीतियां इसमें बड़ी रुकावट बन रही हैं:
- अस्थिर नीतियां: कपास पर आयात शुल्क को अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच हटाया गया था, लेकिन 1 जनवरी 2026 से इसे फिर लागू कर दिया गया. इस ‘कभी हाँ-कभी ना’ वाली नीति से मिल मालिक भविष्य की योजना नहीं बना पा रहे हैं.
- ग्लोबल कंपटीशन: एशिया के अन्य प्रतिस्पर्धी देशों में कपास का आयात ड्यूटी-फ्री (कर मुक्त) है, जिससे भारतीय कपड़ा विदेशी बाजारों में महंगा और अप्रतिस्पर्धी हो रहा है.
- निर्यात में गिरावट: वित्त वर्ष 2026 (FY26) में भारत का कपड़ा निर्यात 2.2% गिरकर 35.79 अरब डॉलर रह गया है, जो 2030 तक 100 अरब डॉलर के निर्यात लक्ष्य को मुश्किल बना रहा है.
रिपोर्ट में सुझाए गए समाधान
CITI और वैश्विक संस्थाओं (Gherzi व ICAC) ने सरकार को कुछ ठोस सुझाव दिए हैं:
- ₹1,500 करोड़ का बफर फंड: सरकार भारतीय कपास निगम (CCI) को प्रति वर्ष लगभग 1,500 करोड़ रुपये की सहायता दे, ताकि मिलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी कीमतों पर कपास मिल सके.
- रणनीतिक भंडार (Strategic Reserve): चीन की तर्ज पर भारत को भी 3 महीने की खपत के बराबर कपास का रिजर्व स्टॉक रखना चाहिए ताकि कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से बचा जा सके.
- ब्याज में राहत: पीक सीजन (नवंबर से मार्च) के दौरान खरीदारी के लिए ‘कपास मूल्य स्थिरीकरण कोष’ बनाने और ब्याज में 5% की छूट देने का प्रस्ताव दिया गया है.
किसान और उद्योग: ‘5F’ विजन
CITI के चेयरमैन अश्विन चंद्रन ने कहा कि उद्योग और किसान एक-दूसरे के पूरक हैं. उन्होंने सरकार के 5F विजन (Farm to Fibre to Factory to Fashion to Foreign) का जिक्र करते हुए कहा कि एक फलता-फूलता कपड़ा उद्योग ही किसानों का सबसे बड़ा ग्राहक बन सकता है. रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि भारत में कपास की पैदावार (Yield) स्थिर हो गई है, जबकि उत्पादन लागत बढ़ रही है. इससे किसानों को बाजार के सही दाम नहीं मिल पा रहे हैं.
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