LPG Price : मिडल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईंधन की बढ़ती कीमतों ने दुनिया भर में रसोई गैस की चिंता बढ़ा दी है. जहां भारत में कई परिवार एलपीजी सिलेंडर की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे हैं, वहीं दुनिया के कुछ ऐसे देश भी हैं जहां प्राकृतिक गैस के विशाल भंडार और सरकारी सब्सिडी की वजह से एलपीजी बहुत सस्ती है.
अल्जीरिया: दुनिया में सबसे सस्ता एलपीजी
अल्जीरिया को दुनिया में सबसे सस्ती एलपीजी देने वाले देशों में गिना जाता है. यहां एलपीजी की कीमत लगभग 7 से 9 रुपये प्रति लीटर है.
- कारण: भारी प्राकृतिक गैस भंडार, मजबूत घरेलू उत्पादन और सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी. विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर होना इस देश के नागरिकों को वैश्विक उतार-चढ़ाव से बचाता है.
कतर: निर्यात और सस्ती दरें
दुनिया के सबसे बड़े गैस निर्यातकों में से एक, कतर भी अपने निवासियों को बहुत सस्ती दरों पर एलपीजी देता है.
- कीमत: यहां एलपीजी की दरें 10 से 13 रुपये प्रति लीटर के बीच रहने का अनुमान है. इसका कारण यहां के विशाल गैस भंडार और मजबूत ऊर्जा अर्थव्यवस्था है.
कुवैत: पेट्रोलियम भंडार का फायदा
कुवैत एक और खाड़ी देश है जो अपनी सस्ती एलपीजी कीमतों के लिए जाना जाता है.
- कीमत: यहां कीमतें आमतौर पर 11 से 13 रुपये प्रति लीटर के आसपास रहती हैं. कुवैत को पेट्रोलियम भंडार, सब्सिडी वाली ऊर्जा नीतियों और ईंधन उत्पादों पर कम टैक्स का लाभ मिलता है.
कजाकिस्तान: किफायती ऊर्जा
कजाकिस्तान में भी एलपीजी काफी किफायती है.
- कीमत: यहां के नागरिक लगभग 18 से 22 रुपये प्रति लीटर का भुगतान करते हैं. मजबूत घरेलू उत्पादन यहां की कीमतों को कम रखने में मदद करता है.
इन देशों में एलपीजी इतनी सस्ती क्यों है?
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे मुख्य कारण हैं.
- विशाल भंडार: जिन देशों के पास अपना तेल और गैस भंडार है, वे कम लागत पर ईंधन उत्पादन कर सकते हैं.
- सरकारी सब्सिडी: सरकारें नागरिकों पर बोझ कम करने के लिए कीमतों में सीधे मदद देती हैं.
- आयात पर कम निर्भरता: जो देश ईंधन आयात नहीं करते, उन पर वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों का असर कम होता है.
- बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर: अच्छी ऊर्जा बुनियादी सुविधाएं रिफाइनिंग और परिवहन लागत को कम करती हैं.
अन्य देशों में एलपीजी महंगी क्यों होती जा रही है ?
जो देश कच्चे तेल और एलपीजी के आयात पर निर्भर हैं, उन्हें अक्सर इन समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
- बार-बार कीमतों में बढ़ोतरी और उच्च परिवहन लागत.
- करेंसी एक्सचेंज का दबाव और टैक्स से जुड़ी वृद्धि.
- वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन में रुकावट.
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