आम चुनाव से पहले लोगों को लुभाने का हर संभव प्रयास

प्रो नवल किशोर चौधरी अर्थशास्त्री केंद्रीय बजट 2019-20 अंतरिम बजट है. यह चुनाव पूर्व होने के कारण अंतरिम बजट है. जिसकी अपनी सीमाएं हैं. चुनावी बजट का अपना स्वभाव होता है, चरित्र होता है. अंतरिम बजट की अपनी सीमाएं होती हैं. इन सीमाओं के अंदर यह बजट लोगों को चुनाव के पहले लुभाने का एक […]

प्रो नवल किशोर चौधरी

अर्थशास्त्री

केंद्रीय बजट 2019-20 अंतरिम बजट है. यह चुनाव पूर्व होने के कारण अंतरिम बजट है. जिसकी अपनी सीमाएं हैं. चुनावी बजट का अपना स्वभाव होता है, चरित्र होता है. अंतरिम बजट की अपनी सीमाएं होती हैं. इन सीमाओं के अंदर यह बजट लोगों को चुनाव के पहले लुभाने का एक प्रयास है, लेकिन इसका एक संदर्भ है और यह संदर्भ मुख्य रूप से राजनीतिक है. इस अंतरिम बजट में राजकोषीय घाटा के बढ़ने का भी संकेत है. इसका बुरा प्रभाव महंगाई पर पड़ सकता है. करेंट एकाउंट डेफिसिएट के बढ़ने का भी संकेत है. यह भी शुभ लक्षण नहीं है.

कुल मिला कर यह बजट इस देश के विभिन्न वर्गों, खास कर किसानों और मध्यम वर्गों को आकर्षित करने वाला बजट है. जिसमें कई सकारात्मक बातें हैं. इसके साथ ही यह विपक्षी पार्टियों को अनुत्तरित करता है, लेकिन यह नाकाफी है. यह बजट आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों, खास कर युवाओं के बीच बढ़ती बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली, गरीबी की समस्या और क्षेत्रीय असमानता को दूर करने में अक्षम है.
एनडीए की तीन चुनौतियां स्पष्ट हैं. कृषि संकट और किसानों की समस्या सिर्फ एक राजनीतिक या सामाजिक मुद्दा बन कर नहीं उभरी है, बल्कि राजनीतिक मुद्दा के रूप में उभरी है. पूरे देश में किसान आंदोलनरत हैं. दिल्ली और मुंबई में किसानों का बड़ा मार्च हो चुका है. विपक्षी पार्टियों खास कर कांग्रेस ने इस मुद्दों को एक बड़े मुद्दे के रूप में उभारा है. इसी संदर्भ में कांग्रेस ने किसानों की ऋण माफी करने का प्रस्ताव भी नहीं किया, बल्कि तीन राज्यों के चुनाव जीतने पर इसे लागू भी किया.
इस तरह से कांग्रेस बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार को किसान विरोधी सरकार बताने में बहुत हद तक सफल रही. इस बजट में किसानों को राहत देना एक तरह से केंद्र सरकार की राजनीतिक मजबूरी बन गयी थी. इसलिए लघु एवं सीमांत किसानों को (पांच एकड़ से कम या पांच एकड़ वाले किसानों) छह हजार रुपये का अनुदान हर वर्ष सीधे उनके बैंक एकाउंट में डालने का प्रावधान किया
गया है. यह इस बजट की सबसे मुख्य बात है.
इसके साथ गौ पालन को बढ़ावा देने के लिए कामधेनु योजना, मत्स्य विभाग का सृजन राहत पहुंचने का प्रस्ताव ही नहीं, बल्कि यह भी संदेश देने का है कि यह सरकार केवल कॉरपोरेट नहीं किसानों, मजदूरों और मध्य वर्गों को भी ध्यान में रखती है. इनकम टैक्स का स्लैब भी मध्य वर्ग को राहत दे रहा है, लेकिन हेल्थ और शिक्षा पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है. रेल के विकास पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया है. क्षेत्रीय असमानता को दूर करने की भी कोई पहल इस बजट में नहीं दिखती है. बिहार जैसे पिछड़े राज्य के लिए भी कोई विशेष योजना नहीं है यह चिंता की बात है.

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