पिछले कुछ सालों में भारतीय कार खरीदारों के बीच एक नया शब्द तेजी से लोकप्रिय हुआ है- ADAS यानी Advanced Driver Assistance Systems. पहले यह तकनीक सिर्फ लक्जरी कारों तक सीमित थी, लेकिन अब महिंद्रा XUV700, हुंडई क्रेटा, किया सायरोस और मारुति सुज़ुकी विक्टोरिस जैसी मेनस्ट्रीम की गाड़ियों में भी मिलने लगी है. सवाल यह है कि यह तकनीक वास्तव में भारतीय सड़कों पर कितनी कारगर है.
ADAS क्या है और कैसे काम करता है
ADAS को आप कार का डिजिटल को-ड्राइवर मान सकते हैं. इसमें कैमरे और रडार सेंसर लगे होते हैं जो आसपास की स्थिति पर नजर रखते हैं. खतरा दिखने पर यह ड्राइवर को चेतावनी देता है या कुछ सेकंड के लिए खुद हस्तक्षेप करता है. ध्यान रहे, यह कार को पूरी तरह सेल्फ-ड्राइविंग नहीं बनाता.
भारत में मिलने वाले फीचर्स
अधिकतर कारें Level 1 या Level 2 ADAS देती हैं. इनमें शामिल हैं:
- ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग (AEB)
- एडैप्टिव क्रूज कंट्रोल (ACC)
- लेन डिपार्चर वार्निंग और लेन कीप असिस्ट
- ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग
- हाई बीम असिस्ट
- ड्राइवर अटेंशन वार्निंग.
भारतीय सड़कों पर चुनौतियां
भारत में लेन मार्किंग अक्सर धुंधली या गायब रहती हैं और ट्रैफिक व्यवहार भी अप्रत्याशित होता है. दोपहिया वाहनों का अचानक लेन बदलना, पैदल यात्रियों का सड़क पार करना और हाईवे पर जानवरों का आ जाना, इन सबके कारण सेंसर कभी-कभी सही ढंग से काम नहीं कर पाते.
कौन-से फीचर्स सबसे उपयोगी?
- ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग: अचानक ब्रेक लगाने की स्थिति में टक्कर से बचा सकता है
- ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग: हाईवे पर बाइक और छोटे वाहनों से टकराव रोकने में मददगार
- रियर क्रॉस-ट्रैफिक अलर्ट:भीड़भाड़ वाले पार्किंग एरिया में कार निकालते समय उपयोगी
- ड्राइवर अटेंशन वार्निंग: लंबी ड्राइव में थकान का पता लगाकर ब्रेक लेने की सलाह देता है.
कहां सबसे अच्छा काम करता है?
ADAS हाईवे और एक्सप्रेसवे जैसी व्यवस्थित सड़कों पर सबसे प्रभावी है. यहां ट्रैफिक एक दिशा में चलता है और लेन मार्किंग साफ होती हैं. शहरों में, जहां ट्रैफिक अव्यवस्थित होता है, कुछ फीचर्स उतने प्रैक्टिकल नहीं लगते.
यह भी पढ़ें: पुरानी कार में आफ्टरमार्केट 360-डिग्री कैमरा सिस्टम लगवाना कितना सही? क्या हैं ऑप्शंस
