अभिमत

Columns, Review, Guest Authors

और कमजोर होगा रुपया!

।। डॉ अश्विनी महाजन ।।
(एसोसिएट प्रोफेसर, दिल्ली विवि)
बीते करीब दो वर्षों के दौरान रुपया काफी कमजोर हुआ है. मार्च, 2011 में 44.5 रुपये प्रति डॉलर से गिरता हुआ मार्च, 2013 में 54 से 55 रुपये प्रति डॉलर के बीच झूलता रहा. हालांकि बीते एक माह में रुपये में गिरावट के कोई विशेष चिह्न् दिखे, पर विदेशी भुगतान की लगातार बिगड़ती स्थितियों के चलते रुपये की कमजोरी का खतरा बढ़ गया है.

पंडित नेहरू का चुनाव क्षेत्र

।।सुरेंद्र किशोर।।
(वरिष्ठ पत्रकार)

बातों-बातों में दिखता सच

।।अरविंद मोहन।।
(वरिष्ठ पत्रकार)

स्थानीय जनतंत्र और हिंसा

।। बद्री नारायण ।।
(दलित मामलों के जानकार)
- भारतीय जनतंत्र में बाहुबली, माफिया अनुभव काफी अनोखा है. जनप्रतिनिधियों के नाम पर खुद माफिया जनतांत्रिक रूप से चुने गये शासक समूह का हिस्सा बन बैठे हैं. -

वादे हैं, वादों का क्या

।। कृष्ण प्रताप सिंह ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
लाल कृष्ण आडवाणी की तारीफ, कांग्रेस पर हमला, तीसरे मोर्चे का राग और फिर डॉ मनमोहन सिंह के थोड़े ‘कड़े’, पर चिदंबरम के मान-मनौवलवाले रुख के बाद सरकार से समर्थन वापस न लेने का ऐलान! मुलायम सिंह फिर चर्चा में हैं. उनकी आधारभूमि उत्तर प्रदेश में भी उन्हें समझना मुश्किल हो रहा है.

तीसरे मोरचे की संभावनाएं

।। शीतला सिंह ।।
(जनमोर्चा के संपादक)
- मायावती, ममता और जयललिता तीन ऐसी शक्तियां हैं, जिन्हें कम करके नहीं देखा जा सकता, लेकिन चुनावी एकता की संभावना इसलिए कम है, क्योंकि ये तीनों ही व्यक्तिवादी हैं. -

मानवता की ओर कुछ कदम

।। विश्वनाथ सचदेव ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
सन 2012 की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मों में एक मलयालम फिल्म भी है, जिसे राष्ट्रीय एकता पर आधारित कथा के लिए पुरस्कृत किया गया है. निर्माता-निर्देशक बाबू थिरुवल्ला की यह फिल्म मुख्यत: दो महिलाओं की कहानी है. एक बूढ़ी हिंदू महिला जीवन से तंग आकर रेलगाड़ी के आगे जान देने की कोशिश करती है. संयोग से एक मुसलमान युवती उसे देख लेती है, बचा लेती है. फिर वह उसे अपने घर ले जाती है, अपने परिवार का हिस्सा बना कर रखती है और इस बात का पूरा ध्यान रखती है कि बूढ़ी अम्मा की धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुंचे. फिल्म की विशेषता यह है यह कहानी काल्पनिक नहीं, सच्ची है.

मोदी को आगे बढ़ाने के मायने

।। संजय कुमार ।।
(फेलो, सीएसडीएस)
- भाजपा इस मौके का दोहरा लाभ उठाना चाह रही है. पहला, नेतृत्व के लिए एक नेता की तलाश और दूसरा, कम से कम अगले लोकसभा चुनाव तक के लिए पार्टी में अतर्विरोधों का खात्मा. -

विवेकानंद और वैश्वीकरण

।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।
(अर्थशास्त्री)
इस वर्ष स्वामी विवेकानंद का 150वां जन्मदिन मन रहा है. स्वामीजी की विशेषता थी कि उन्होंने आम आदमी को अपने चिंतन के केंद्र में रखा था. स्वामीजी का मानना था कि भारतीय समाज के पिछड़ेपन को दूर करने का उपाय गरीब को शिक्षा देना था. देश के नागरिक यदि भाग्य पर निर्भर रहने के स्थान पर कर्म पर ध्यान देंगे, तो देश उठ खड़ा होगा.

ब्रिक्स के बहाने अफ्रीका

।। नरेंद्र पाल सिंह ।।
(कार्यकारी संपादक, प्रभात खबर)
- आज अफ्रीका में चीन की करीब दो हजार कंपनियां काम कर रही हैं. जानकारों के मुताबिक अफ्रीका के संसधानों के बदले ढांचा खड़ा करने की चीन की नीति उसी का हित ज्यादा साधती है. -