।। डॉ भरत झुनझुनवाला ।।
(अर्थशास्त्री)
देश की आर्थिक विकास दर दबाव में है. चंद वर्षो पूर्व हम 9 प्रतिशत की विकास दर को छू रहे थे. आज 6 प्रतिशत भी हासिल कर पाने में संदेह है. मूल समस्या बढ़ते वित्तीय घाटे की है. सरकार की आय कम और खर्च ज्यादा है. इस घाटे की पूर्ति के लिए सरकार ऋण के बोझ से दब रही है.
।। रविभूषण ।।
(वरिष्ठ साहित्यकार)
- निर्लज्ज पूंजी से निर्लज्ज राजनीति जुड़ी हुई है और राजनीति से जुड़े लोगों को इसकी परवाह नहीं है कि उनके संबंध में दूसरे लोग क्या सोचते हैं, कैसी धारणा रखते हैं. -
।। कृपाशंकर चौबे ।।
(एसोसिएट प्रोफेसर, म. गां.अं. हिंदी विवि)
कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले में केंद्र सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भले तल्ख लग रही हो, हालात कहीं उससे भी ज्यादा तल्ख और भयावह हैं. घोटाले पर सीबीआइ की स्टेटस रिपोर्ट केंद्र सरकार से साझा करने का एक आशय यह है कि सीबीआइ राजनीतिक दबाव में काम करती रही है. इसीलिए केंद्र सरकार अपने विरोधी नेताओं को सीबीआइ का डर दिखाती रही है.
।। किशोर झा ।।
- शाहबाग आंदोलन धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के मूल्यों में यकीन करनेवाला एक ऐसा आंदोलन है, जो 1971 के युद्ध अपराधों के गुनहगारों को कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहा है. हैरानी की बात यह है कि भारत के प्रगतिशील और जनवादी खेमे में भी इस आंदोलन को लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं दिखती. वामपंथी पार्टियों की चुप्पी चुभनेवाली है. भारत के प्रगतिशीत तबके को जवाब देना होगा कि वह बांग्लादेशी तहरीक के साथ एकजुटता क्यों नहीं जता सका. -
।। एमजे अकबर ।।
(वरिष्ष्ठ पत्रकार हैं)
- युवा शक्ति कभी-कभार ही सत्ता प्रतिष्ठान के लिए अच्छी खबर होती है. पाकिस्तान में इमरान खान की सफलता चुनाव परिणाम के बाद इसी पैमाने पर आंकी जायेगी, लेकिन अगर वे आज आगे बढ़ रहे हैं, तो इसीलिए क्योंकि युवा उनके साथ खड़े हैं. जब भारत में मतदान होगा तो युवा ही फर्क पैदा करेंगे. यह सुझाव देना भ्रामक है कि युवा केवल युवा के लिए मतदान करते हैं. -
।। अरविंद मोहन ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
- कल की राजनीति के लिए काफी सारे सूत्र कर्नाटक से निकलते नजर आते हैं. कांग्रेस जीती तो खेल अलग होगा, पर भाजपा अपना गढ़ बचाने में सफल हुई, तो खेल एकदम अलग होगा. -
।। सुरेंद्र किशोर ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष दामोदरन संजीवैया का निधन मात्र 51 साल की उम्र में हुआ था. चाहे कोई कितना भी बलशाली या प्रभावशाली क्यों न हो, पर सच यही है कि मत्यु ही विजयी होती है.
।।अमिताभ बच्चन।।
(प्रख्यात अभिनेता)
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के सौ साल के सफर पर मुङो गर्व है. इस दौरान भारतीय सिनेमा ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. खास कर शुरू के जो साल थे, उसमें फिल्मों को समाज में ज्यादा अहमियत नहीं दी जाती थी. अच्छे घरों के बच्चों को फिल्मों में नहीं आने दिया जाता था. हालांकि मुङो खुशी है कि मेरा परिवार कभी इसके खिलाफ नहीं था. हां, इतना जरूर था कि जब मैं छोटा था, मेरे माता-पिता किसी फिल्म को पहले खुद देखते थे, फिर अनुमान लगाते थे कि यह फिल्म बच्चों को दिखाने के लायक है या नहीं.
।।विनोद अनुपम।।
(फिल्म समीक्षक)
महात्मा गांधी ने 1926 में ‘यंग इंडिया’ में सिनेमा की आलोचना करते हुए लिखा था-‘इसका बुरा प्रभाव प्रतिदिन जबरदस्ती मेरे ऊपर पड़ता है’. 1935 में प्रेमचंद ने ‘हंस’ में लिखा- ‘सिनेमा अगर हमारे जीवन को स्वस्थ आनंद नहीं दे पाता है, हममें निर्लज्जता, धूर्तता और कुरुचि को बढ़ाता है और पशुता की ओर ले जाता है, तो जितनी जल्दी उसका निशान मिट जाये, उतना अच्छा’. भारत में सिनेमा की यह विडंबना ही मानी जायेगी कि 3 मई, 1913 को पहली भारतीय फिल्म का प्रदर्शन होने के मात्र 13 वर्षों बाद ही लोगों की भृकुटियां इस पर टेढ़ी होने लगी थी.
।। अजय सिंह ।।
(मैनेजिंग एडिटर, गवर्नेस नाऊ)
- शायद सुप्रीम कोर्ट में सिन्हा का हलफनामा अपने आप में इस तथ्य की मूक स्वीकृति है कि देश की शीर्ष जांच एजेंसी के पास अपने कामकाज संबंधी स्वायत्तता भी नहीं है. -
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