।। संजय कुमार ।।
(राजनीतिक विश्लेषक)
- अगर राष्ट्रीय नेताओं के लिए क्षेत्रीय नेताओं को उनके गृह राज्य में चुनौती देना मुश्किल है, तो क्या अब तक गुजरात में सीमित रहे नरेंद्र मोदी उन्हें उनके गृह राज्यों में चुनौती दे पायेंगे? -
।। कृष्ण प्रताप सिंह ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
आपको याद होगा, सेना में नौकरी ज्वाइन करने मुंबई गयी और तेजाब-हमले की शिकार हुई दिल्ली की प्रीति राठी मौत से जूझ रही थी, तो मुंबई महानगर निगम प्रस्ताव पारित कर रहा था कि अंतर्वस्त्रों की दुकानों से महिलाओं के वे ‘अश्लील व भड़काऊ’ पुतले हटा दिये जायें जो उनके डमी शरीर को अल्पतम ढकने के कारण लज्जित या उत्तेजित करते हैं और यौन हमलों के लिए उकसाते हैं.
।।एमजे अकबर।।
(वरिष्ष्ठ पत्रकार हैं)
हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हम सबसे अपनी ‘नकारात्मकता’ त्यागने की अपील की. मैं उनकी इस अपील के बाद काफी देर तक एक के बाद उजागर हुए और हो रहे घोटालों, अर्थव्यवस्था के गहराते संकट और क्रिकेटरों तथा सट्टेबाजों के बीच के अंतरंग संबंधों के बीच से इस बारे में सोचता रहा. लेकिन हाय! सकारात्मकता को खोज पाना नामुमकिन-सा था. अचानक यह कोलकाता के ठीक बीच में पाया गया.
।।चंदन श्रीवास्तव।।
अगर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की एक महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षक है, तो अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देने के इस युग में सरकार की तरफ से हरचंद ऐसी कोशिश हुई है कि शिक्षक, पढ़ानेवाला कम और न्यूनतम मजदूरी को तरसता मजदूर ज्यादा नजर आये. वह कहीं ‘शिक्षा-मित्र’ (बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश) कहलाता है, तो कहीं ‘पारा शिक्षक’ (झारखंड), तो कहीं ‘विद्या-वालंटियर’ (आंध्रप्रदेश). अगर उसे कुछ नहीं कहा जाता तो शिक्षक.
।। अनंत विजय ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
- नेताओं की महत्वाकांक्षाओं की टकराहट के बीच गोवा में हो रही भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के संबंध में कोई साफ संदेश निकलना चाहिए. -
।। विवेक शुक्ला ।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
एक लंबे इंतजार के बाद केंद्र सरकार ने अपने आशियाने का सपना देखने वालों के हक में एक अहम फैसला लिया है. केंद्रीय मंत्रिमंडल ने रियल एस्टेट रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट बिल को मंजूरी दे दी है. पर सवाल यह है कि क्या अब रियल एस्टेट की दुनिया में सब कुछ सुधर जायेगा? जाहिर है, इस सवाल का जवाब तो तभी मिल पायेगा, जब यह बिल संसद से पारित होकर कानून का रूप लेगा. फिलहाल जरूरी यह है कि लंबे-चौड़े विज्ञापनों से झांसा दे रही रियल एस्टेट कंपनियां इस बिल के कानून बनने से पहले अपने ग्राहकों के हितों पर भी गौर करें.
।।सुरेंद्र किशोर।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
कभी हॉकी के अंतरराष्ट्रीय मैचों में भारत की धूम मची रहती थी. पर, समय के साथ देश की हॉकी उदास हो गयी. अपने निधन से साल भर पहले हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद ने कहा था कि राजनीति ने हॉकी का सत्यानाश कर दिया. उन्होंने इसके कुछ अन्य कारण भी बताये थे. भारतीय हॉकी की दशा देख कर ध्यानचंद अपने जीवन के अंतिम दिनों में काफी निराश थे. उनका निधन 1979 में हुआ. उन्होंने 1948 में हॉकी का अंतिम मैच खेला था.
।।अरविंद मोहन।।
(वरिष्ठ पत्रकार)
महाराजगंज संसदीय क्षेत्र का उपचुनाव भले ही साल भर से कम समय के लिए नया सांसद चुनने के लिए हुआ हो, पर इस पर सबकी आंखें यूं ही नहीं लगी थीं. इस चुनाव का महत्व बिहार की राजनीति और नीतीश सरकार के आठ साल के शासन के हिसाब से काफी बड़ा था, तो लालू प्रसाद की वापसी की उम्मीदों के हिसाब से भी कम बड़ा न था. पर बात इतनी होती तो इसे सिर्फ बिहार की लड़ाई का सेमीफाइनल कहा जाता, राष्ट्रीय राजनीति का सेमीफाइनल नहीं.
।। पुष्परंजन ।।
(नयी दिल्ली संपादक, ईयू-एशिया न्यूज)
- ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ की कूटनीति करनेवाले यूरोपीय संघ को शायद यह गलतफहमी है कि भारत एक कमजोर कूटनीति करनेवाला देश है, इसलिए उसे प्रस्तावों के जरिये दबाये रखो. -
।। शीतला सिंह ।।
(जनमोर्चा के संपादक)
केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) ने अपने एक फैसले में राजनीतिक दलों को सूचना अधिकार कानून के तहत जवाबदेह माना है. आयोग की पूर्णपीठ ने दलों का यह तर्क स्वीकार नहीं किया कि वे सरकारी सहायता से चलने, उनसे अनुदान प्राप्त करनेवाले संगठन नहीं हैं, इसलिए वे इस कानून से मुक्त हैं. सीआइसी का मानना है कि वे केंद्र सरकार की ओर से परोक्ष रूप से वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं, सार्वजनिक कामकाज के निष्पादन के अधिकार और जवाबदेही के लिए संवैधानिक प्रावधानों का प्रयोग करते हैं, इसलिए उनसे संगठन के संबंध में जो भी सूचनाएं मांगी जाएं, वे उन्हें देनी चाहिए.