।। हरिवंश ।। - एक बिजनेस अखबार में छपी खबर के अनुसार भारत में महज 8200 लोगों के पास देश की 70 फ़ीसदी संपत्ति है. भले ही दुनिया की अर्थव्यवस्था में संकट हो, पर भारत में अमीरों की संख्या बढ़ रही है. अंतरराष्ट्रीय वेल्थ इनटेलीजेंस कंपनी वेल्थएक्स ने वर्ल्ड अल्ट्रावेल्थ रिपोर्ट जारी की है. इसके अनुसार भारत में इन दिनों अल्ट्राहाइ नेटवर्थवालों या बड़े अमीरों की संख्या 8200 है. इनकी कुल संपत्ति 945 अरब डालर (लगभग 37300 अरब रुपये) हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में अमीरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. क्योंकि यहां रोज ही करोड़पति बन रहे हैं. बहुत कम समय में अमीर बननेवाले लोग भारत में ही हैं. -
इन दिनों कहीं आपने ऐसी बातें सुनी हैं, जिनमें भारतीयता की चर्चा हो? भारत को सुदृढ़, समृद्ध और ताकतवर बनाने का सपना हो? संसद से विधानसभाओं तक, राष्ट्रीय दल के नेताओं से लेकर उभरे छत्रपों की बातों में? जाति-उपजाति, धर्म, क्षेत्र और अपनी-अपनी पहचान- अस्मिता की राजनीति हो रही है? श्रीलंका के खिलाफ़ भारत का प्रस्ताव दुनिया ने देखा. बेअंत सिंह के हत्यारे की फ़ांसी का मसला जैसे उठा व रुका, उससे क्या संदेश निकला? बलवंत सिंह राजोआना (जिन पर पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या का आरोप है) ने कभी दया याचिका (मर्सीपिटीशन) नहीं दी.
जेल ने दो-दो बार पंजाब हाइकोर्ट के फ़ैसले को लौटाया. क्या कानूनन जेल ऐसा कर सकता है? अंत में लोक दबाव पर केंद्र झुका. फ़िर उच्चतम न्यायालय ने नाराजगी व्यक्त की. यह स्थिति क्यों उत्पन्न होने दी गयी? कल कश्मीर में अफ़जल गुरु के प्रसंग पर ऐसा ही दबाव खड़ा होगा, तब भारत सरकार का क्या रुख होगा? हमारा यह नहीं मानना है कि किसको फ़ांसी हो, न हो. बल्कि मूल सवाल है कि यह देश किसी कानून से चलेगा या समूहों के दबाव और जुबान कानून होंगे?
आज ममता बनर्जी कहतीं हैं कि केंद्र सरकार विभिन्न टैक्सों वगैरह के स्रोत से बंगाल से 22-23 हजार करोड़ से अधिक पैसे ले जाती है. पर हमें क्या लौटाती है? यही सवाल महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों में भी उठते रहे हैं. बहुत पहले से. फ़िर उठ रहे हैं. क्या केंद्र कोई विदेशी शासन है या अपना है? यह सही है कि केंद्र की नीतियों में विसंगति है. एक दिल्ली या एक मुंबई के म्युनिशिपल कारपोरेशन का बजट, कई राज्यों के बराबर है.
कुछेक वर्ष पहले तो बिहार, झारखंड और बंगाल जैसे राज्यों से इन म्युनिशिपल कारपोरेशनों के बजट कई गुना अधिक होते थे. केंद्र को आर्थिक विषमता के ऐसे सवालों को जरूर हल करना चाहिए. खुद पहल कर. पर विभिन्न राज्य और उनके राजनेता जिस तरह से आचरण कर रहे हैं, उससे तो एक नया खतरा पैदा हो गया है.
एनसीटीसी (नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर) को लेकर राजनीति हो रही है. आतंकवाद आज छद्म भेष में किसी देश पर बाहरी हमले का उपनाम है. यह बाहरी हमले से ज्यादा देशतोड़क और खतरनाक है. जब आतंकवादी हमले होते हैं, तो सारे छत्रप केंद्र को भला-बुरा कहते हैं. एक स्वर में. पर केंद्र इसे रोकने की पहल करता है, तो दर्जनों सरकारें इसके खिलाफ़ खड़ी होती हैं.
क्या देश ऐसे चलता है? यह रिसपांसिबुल राजनीति है? फ़िर रेलवे सुरक्षा बल अधिनियम (आरपीएफ़ एक्ट) पर बवाल उठा. इसका भी विरोध हुआ. नरेंद्र मोदी को लगता है कि उनसे पूछ कर देश में हर कानून बने. भारतीय इस्पात मंत्रालय ने 2011 में चार स्टील प्लांट लगाने का प्रस्ताव दिया था. पर ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक की सरकारों ने जवाब तक नहीं दिया. और ये सरकारें कहेंगी कि विकास के लिए केंद्र कोई पहल नहीं करता.
इस बार संसद सत्र शुरू होने के पहले सरकार की सहयोगी पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने संघीय ढांचा को बड़ा मुद्दा बनाया. कई मुद्दों को उठा कर. लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार द्वारा बुलायी गयी बैठक में, अन्नाद्रमुक, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने संघीय ढांचे पर केंद्र के प्रहार की बात उठायी.
मशहूर चिंतक और समाजवादी राजनेता मधु लिमये ने लिखा था, 1984-85 के आसपास. ‘लगभग 2500 वर्षों के ज्ञात इतिहास में भारत में स्थिर केंद्रीय शासन के चार संक्षिप्त युग रहे हैं - मौर्य काल, मुगल काल, ब्रिटिश काल और आजादी के बाद के चालीस से कम वर्ष. इसमें पहला और अंतिम शासन ही देश की धरती से निकले थे. तीसरा पूरी तरह विदेशी था और दूसरा शुरू में विदेशी था लेकिन तीन पीढ़ियों के बाद देशी बनने लगा था. इन 600 सालों को छोड़ कर शेष 1900 सालों में भारत आपस में लड़ते राजाओं और क्षेत्रीय शक्तियों का देश रहा. हाल की घटनाएं चिंतित करनेवाली हैं. क्या एकीकृत शासन का चौथा दौर सबसे छोटा सिद्ध होगा?
क्या इस तरह नौटंकी से देश चलता है? आज भारतीय संघ को मजबूत किये बिना भारत की कल्पना सही है? क्या भारतीयता का सपना कहीं किसी दल के राष्ट्रीय एजेंडा में है?
Haribans ka likha hua padha. Unhone likha hai ki aaj 8200 logon ke pas es des ka 70% sampati hai yah bahut hi dukh tatha sharm ki bat hai. lekin des es esthiti me ek din me to pahucha nahi des ko es esthiti me pahuchane me kiska kitna yogdan hai yah charcha ki baat hai. Aaj vi Bank en logon ko hi loan dete hain jinke pas bahut Black White Money hai ya jo bank difaulter hain.
Aaj koi school / college /hospital jaise buniadi sahulten pura karne ke liye Bank se loan lene jata hai to bank 50 tarah ki jaruri / garjaruri conditions laga kar loan nahi dete. Jabki Kingfisher /airlines mahakme ko Hawabaji ke liye 1000 karore ka loan easily mil jata hai.
BANKON KI POLICY YA TO ANJANE ME GALAT HAI YA JAN BUJH KAR APNI SWARTH PURTI KE LIYE
ANDHE BANTE HAIN YAH RESEARCH KA SUBJECT HAI.
Beshak sahi kah rahe hai kya desh me kanun hai? Agar hai to kanun ki upeksha kyon? Kis ko pansi deni hai ya nahi deni hai ye kanun tay karega ki koi khas samuh. Bahut sharm ki baat hai ki aise muddon par kanun ko darkinar kar kisi khas samuday to santusht karna kendra sarkar ki napunskta ko hi pardarshit karta hai. Ek Khas samuday koi bhi nirnay kanun ke khilaf leta hai aur use kendra sarkar man leti hai. Desh ke kanun se khilwad nahi hai to kya hai. Kejriwal sahi kahte hai ki desh ke sansad me saansad kitne jimmewar kism ke log hai. Kya jo desh ke kuchh achhe saansad jo saf suthre hai unka farz nahi banta hai ki jo dagi saansad hai unka virodh karen. Kyon chup hai saf suthre saansad log.
I completely agree with the topic mentioned in the article...but this problem cannot be solved ever, not because it is impossible but because no one is going to take any step to solve this...as we are governed by Khichdi (more than one party) government. It doesn't mean that if a single party win then something will change because then they will take that as their opportunity to make their own property......everyone (especially responsible person of society like politicians, teachers, Govt. officials.....different governing bodies.....etc which are responsible for making society better..)....and they also not help others who wanted to change it like Anna and their group....they just create difficulties for them also so that they cannot go against them....whole society is corrupt and person responsible for making it better are most corrupt....so what i can do and suggest to everyone is to make ourselves responsible towards society.....thats all
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