।। रविभूषण ।।
- खुशामदियों की भीड़ बढ़ रही है. जहां यह नगण्य है, वहां अकेलापन और सन्नाटा है. राजनीतिक दल भीतर से खोखले हो रहे हैं और सब मिल कर देश को खोखला कर रहे हैं.-
समकालीन भारतीय राजनीति में देश प्रमुख है या पार्टी, परिवार और पूंजी? क्या किसी भी अर्थ और हालत में देश से अधिक महत्व किसी भी राजनीतिक दल, किसी भी परिवार और पूंजी को दिया जाना चाहिए? क्या देश की आत्मा कराह नहीं रही है और राजनीति से विचारधारा गायब नहीं हो गयी है? गांधी, नेहरू, दीनदयाल उपाध्याय, लोहिया, नरेंद्रदेव, जयप्रकाश नारायण, अंबेडकर और माक्र्स-एंगेल्स की अब क्या केवल आरती उतारी नहीं जा रही है? राजनीति ने विचारधारा से किनारा कर लिया है. वहां विचार का संहार हो चुका है. संसदीय लोकतंत्र का वास्तविक चेहरा उजागर हो चुका है.
सत्ता प्राप्ति के लिए किसी भी हद तक जाया जा सकता है. किसी प्रकार का हथकंडा अपनाया जा सकता है. यह गंठजोड़ नहीं, जोड़-तोड़ की राजनीति है. इक्कीसवीं सदी का भारत मध्यकालीन सामंतवाद की याद दिलाता है. इस आधुनिक मध्यकालीनता ने धर्म, जाति, वंश, वफ़ादारी, चाटुकारी को बढ़ावा दिया है.
इतना अधिक वंशवाद, परिवारवाद पहले नहीं था. कांग्रेस से अधिसंख्य दलों ने सीख हासिल की है. सोनिया गांधी-राहुल गांधी, प्रकाश सिंह बादल-सुखबीर सिंह बादल, फ़ारूक अब्दुल्ला-उमर अब्दुल्ला, मुलायम सिंह यादव-अखिलेश यादव, हेमवतीनंदन बहुगुणा-रीता बहुगुणा-विजय बहुगुणा, एम करुणानिधि-कनिमोझी, भूपेंद्र हुड्डा-दीपेंदर हुड्डा, सुनील दत्त-प्रिया दत्त, राजेश पायलट-सचिन पायलट, माधवराव सिंधिया-ज्योतिरादित्य सिंधिया, एचडी देवगौड़ा-एचडी कुमारस्वामी, देवीलाल-ओमप्रकाश चौटाला, चरण सिंह-अजित सिंह-जयंत चौधरी, शरद पवार-सुप्रिया शुले, मुरली देवड़ा-मिलिंद देवड़ा, पीए संगमा-अगाथा संगमा, लालू प्रसाद-राबड़ी देवी, बीजू पटनायक-नवीन पटनायक, भागवत झा आजाद-कीर्ति आजाद, ललित नारायण मिश्र- जगन्नाथ मिश्र आदि-आदि.
यह परिवार सूची और बढ़ायी जा सकती है. क्या पूरब, क्या पश्चिम, क्या उत्तर, क्या दक्षिण- सभी दिशाओं में, सभी राज्यों में यह वंशवाद फ़ैला हुआ है. दल कोई भी हो-राष्ट्रीय या क्षेत्रीय, चंद अपवादों को छोड़ कर यह मारा-मारी सर्वत्र है. वंशवाद की घनी छांह में भारतीय लोकतंत्र कराह रहा है. यह बंधक है. भारतीय राजनीति में वंशवाद पर गंभीर शोध-कार्य किये जाने की आवश्यकता है. यह नव सामंतवाद है.
राजनीतिक दलों में योग्य समर्पित, विवेकी, उत्साही कार्यकर्ताओं की कमी है. बुजुर्गो ने जो रास्ता दिखाये हैं, उन पर चलने और दौड़ने में, दूसरों को धकियाने-लतियाने में ही फ़ायदा है. भारतीय राजनीति में वशंवाद को स्वीकृति मिल चुकी है.
पार्टी पर परिवार, अध्यक्ष और पूंजी हावी है, असहमति और विरोध के लिए, तर्क और बहस के लिए पार्टी में स्थान नहीं है. नेता की चयन प्रक्रिया अलोकतांत्रिक है. अभी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का फ़ैसला कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया. यह नयी बात नहीं है. इंदिरा गांधी भी यही करती थीं.
उत्तराखंड के 32 कांग्रेसी विधायकों में से आधे से अधिक विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में नहीं थे. शपथ ग्रहण समारोह में मात्र 11 विधायक उपस्थित थे. हरीश रावत के समर्थक अधिक थे, पर मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा. तर्क, बुद्धि, विवेक का प्रश्न और बहस का स्थान सिमट रहा है. राष्ट्रीय दल हो या क्षेत्रीय दल-सबके अध्यक्षों की कार्यशैली लगभग एक है.
राजनीति में ठकुरसुहाती यों ही नहीं बढ़ी है. अध्यक्ष की अनदेखी नहीं की जा सकती. खुशामदियों की भीड़ बढ़ रही है. जहां यह नगण्य है, वहां अकेलापन और सन्नाटा है. राजनीतिक दल भीतर से खोखले हो रहे हैं और सब मिलकर देश को खोखला कर रहे हैं. कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में अंतर नहीं है. ममता द्वारा दिनेश त्रिवेदी का इस्तीफ़ा लेना, और वह भी रेल बजट के बाद, कोई सामान्य घटना नहीं है.
दिनेश त्रिवेदी ने पार्टी की तुलना में देशहित को महत्व देने की बात कही है. नेता अपनी ताकत दिखाता है. जनता उसे वीभत्स प्रदर्शन के लिए सत्ता नहीं सौंपती. अधिसंख्य सत्ताधारी मदांध और अहंकारी हैं. भारतीय लोकतंत्र को खोखला करने के जिम्मेदार नेता हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों, आचरणों और नीतियों में विश्वास नहीं रखते हैं. सामंती सोच, आचरण प्रमुख हैं. दल चंद व्यक्तियों में सिमट चुका है. दलदल में दल और देश दोनों फ़ंसा हुआ है.
एक ताकतवर नेता दल को परेशान करता है. भाजपा येदियुरप्पा के सामने विवश है. येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बनने को बेचैन हैं. मुख्यमंत्री सदानंद गौड़ा शायद अधिक समय तक नहीं रह सकें. पटेल ने रजवाड़ों का भारत में विलय करा लिया था. अब नये-नये रजवाड़े बन चुके हैं. राजनीति में जिसे भितरघात कहा जाता है, वह चुनाव के समय अधिक दीखता है.
हिमाचल प्रदेश में चुनाव से पहले ही भाजपा नेता एक-दूसरे से भिड़ रहे हैं. मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को अपने प्रतिद्वंद्वी शांता कुमार से खतरा है. चुनाव के पहले वहां एक नये दल हिमाचल लोकहित पार्टी के जन्म की संभावना है.
aaj koi desh ka aam aadmi desh ka pm banne ka sapna nahi dekh sakta kyoki ye demoracy kam rajtantar hai jisme beta ya beti bap ki jagah lete hai .
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