।। डॉ भरत झुनझुनवाला
- सरकारी खर्चो के लिए नोट छापना स्वीकार्य है. परंतु, इसका उपयोग सड़क आदि बनाने में किया जाता है या फ़िर रिसाव करके स्विस बैंक भेज दिया जाता है, हमें अपना ध्यान इस दिशा में लगाना चाहिए. -
साठ के दशक में पांच रुपये में एक डॉलर मिलता था. तब भारत को अति गरीब देश माना जाता था. अमेरिका से दान के रूप में मिले गेहूं से हम अपना पेट भर रहे थे. आज करीब 50 रुपये में एक डॉलर मिलता है.
भारत को विश्व की उभरती महाशक्तियों में गिना जाता है. भारत खाद्यान्न का निर्यात कर रहा है. तब और अब में तुलना से साफ़ है कि रुपये का अवमूल्यन व देश का उत्थान साथ-साथ चल रहा है. कारण है कि हमने नोट छापकर सड़क और बंदरगाह बनाये. नोट छापने से रुपये का अवमूल्यन हुआ, सड़क बनने से देश का विकास. अत: रुपये के अवमूल्यन से घबराना नहीं चाहिए.
रुपये का वैश्विक मूल्य मुख्यत अमेरिकी डॉलर के सामने आंका जाता है. दोनों मुद्राओं पर घरेलू महंगाई का अलग-अलग प्रभाव पड़ता है. रुपये की गुणवत्ता में गिरावट का मुख्य कारण महंगाई है. मान लीजिए 1970 में भारत में एक किलो गेहूं का दाम पांच रुपये था. इसी पांच रुपये में डॉलर मिलता था.
अमेरिका में गेहूं का मूल्य एक डॉलर प्रति किलो हो, तो कांटा मिल जाता है. उसी रकम से दोनों देशों में बराबर माल मिल रहा था. समयक्रम में भारत में महंगाई बढ़ी. गेहूं का दाम दस रुपये प्रति किलो हो गया. परंतु अमेरिका में अब भी एक डॉलर में एक किलो गेहूं मिले, तो स्वाभाविक है कि रुपये का दाम घटेगा. इस नयी परिस्थिति में एक डॉलर में दस रुपये मिले तो कांटा पुन बराबर हो जायेगा. तब एक डॉलर की रकम से पुन: दोनों देशों में एक किलो गेहूं खरीदा जा सकेगा. स्पष्ट होगा कि घरेलू महंगाई के कारण मुद्रा का अवमूल्यन जरूरी हो जाता है.
आर्थिक सुधारों के बाद रुपये के मूल्य में उतार-चढ़ाव का एक और कारण पैदा हो गया है. यह है विदेशी निवेश. यदि मुद्रा बाजार में डॉलर की आवक ज्यादा हो जाये, तो डॉलर का दाम टूटता है और रुपये का चढ़ता है. बिल्कुल उसी तरह जैसे मंडी में आलू के दाम टूटते हैं. इसके विपरीत यदि डॉलर की आवक कम हो जाये, तो डॉलर का दाम चढ़ता है और रुपये का टूटता है.
एक वर्ष पूर्व तक भारत का शेयर बाजार सुदृढ़ था. विदेशी निवेशक मुंबई शेयर बाजार में निवेश कर रहे थे. इसलिए मुद्रा बाजार में डॉलर की आवक ज्यादा थी. डॉलर का दाम कम तथा रुपये का ज्यादा था.
बीते साल जुलाई तक रुपये के मूल्य पर दो परस्पर विरोधी प्रभाव पड़ रहे थे. महंगाई के कारण रुपया टूट रहा था, परंतु विदेशी निवेश के कारण रुपया उठ रहा था. दोनों प्रभावों ने एक-दूसरे की काट की और 2002 से जुलाई 2011 तक रुपये का मूल्य 40 से 50 रुपये प्रति डॉलर पर टिका रहा. जुलाई के बाद परिस्थिति में मौलिक परिवर्तन आया. ग्रीस, पुर्तगाल, इटली तथा आयरलैंड ऋण की अदायगी नहीं कर पा रहे हैं.
यूरोपियन यूनियन की साझा मुद्रा यूरो के टूटने की संभावना बन रही है. इस भावी संकट से रक्षा करने को आतुर निवेशकों ने अपनी संपत्ति को यूरोपीय देशों से हटाकर अमेरिका में लगा दिया है. इससे डॉलर की मांग बढ़ रही है और इसके दाम बढ़ रहे हैं. इससे डॉलर के सामने रुपये के दाम में गिरावट दिख रही है. साथ-साथ विदेशी निवेशकों की दृष्टि में भारत उतर रहा है.
सरकार के घरेलू वित्तीय मैनेजमेंट ने भी मदद नहीं की है. सरकार के घाटे में तीव्र वृद्धि हो रही है. सरकारी खर्च की गुणवत्ता में भी काफ़ी ह्रास हुआ है, जैसा कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध भड़के जनाक्रोश से दिखायी देता है. बजट के रिसाव के कारण अर्थव्यवस्था में ठहराव आया है. सरकारी खजाने से निकली रकम को स्विस बैंक में जमा कराया जा रहा है. इससे अर्थव्यवस्था ढीली पड़ी है, जैसे मरीज का खून निकाल लिया जाये तो वह सुस्त और पीला पड़ जाता है.
उत्पादन ठहरा है और टैक्स में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है. लेकिन सरकारी खर्च बढ़ते चले गये हैं, जिन्हें पोषित करने के लिए सरकार को लगातार नोट छापने पड़ रहे हैं. इससे महंगाई बढ़ रही है. डॉलर के चढ़ने से रुपया पहले ही त्रस्त था. महंगाई के बढ़ने से रुपये पर दुबारा दबाव पड़ रहा है.
कुल मिलाकर परिस्थिति इस प्रकार है. रुपये का दाम घटने का मूल कारण महंगाई है. महंगाई को देखते हुए रुपये का मूल्य 40-50 रुपये प्रति डॉलर उचित दिखता है. रुपये के मूल्य में गिरावट का यह दौर पिछले कई वर्षो में थम गया था, क्योंकि विदेशी पूंजी की आवक से रुपये के टूटने की यह प्रवृत्ति ढक गयी थी. जैसे घाटे में चल रही कंपनी को नया लोन मिल जाये तो कुछ समय के लिए संकट टल गया सा दिखता है.
जुलाई 2011 से दोनों प्रभाव विपरीत हो गये हैं. सरकार का वित्तीय घाटा तेजी से बढ़ा है. इससे महंगाई और बढ़ने को है. यूरोपीय संकट के कारण विदेशी निवेश की आवक कम होने से यह गिरावट अब ढकी नहीं जा रही है. अब यह उजागर हो गयी है.
आने वाले समय में रुपये का मूल्य इन्हीं दोनों प्रवृत्तियों पर निर्भर करेगा. मेरा अनुमान है कि घरेलू संकट गहरायेगा. यूपीए सरकार अपनी पॉलिसियों के प्रति जनता में समर्थन जुटाने में नाकाम है. इसलिए पॉलिसी पैरालिसिस जारी रहेगा. साथ-साथ सत्ता पर पुन: काबिज होने के लालच में सरकार खर्च बढ़ायेगी.
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