।।डॉ डीएन गौतम से किसलय की बातचीत।।
-व्यवस्था से खिन्न डीएन गौतम 29 को दे देंगे इस्तीफ़ा-
-क्या कहा मुख्यमंत्री के सुरक्षा सलाहकार ने-
-एक महीने में ही झारखंड में हो सकता था परिवर्तन
-अफ़सरों को भाषा के संस्कार विकसित करने चाहिए
-व्यक्तिगत तौर पर परेशान किया गया, गेस्ट हाउस छोड़ने के लिए मजबूर किया गया
झारखंड सरकार के सुरक्षा सलाहकार डॉ डीएन गौतम ने पद छोड़ने का मन बना लिया है. 29 फ़रवरी को वह इस्तीफ़ा दे देंगे. गुरुवार को उन्होंने एक विभागीय बैठक में इस बाबत घोषणा करते हुए सहकर्मियों से विदा ली. खबर है कि मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के साथ उनकी फ़ाइनल बातचीत अभी बाकी है. प्रभात खबर से बातचीत में डॉ गौतम इस बार मानने के मूड में नहीं दिखे. दरअसल, झारखंड पुलिस के कतिपय शीर्ष अधिकारियों से वह काफ़ी त्रस्त हैं.
अधिकारियों का निकम्मापन उन्हें कचोटता रहा. जनहित की योजनाओं और निम्न स्तर के पुलिसकर्मियों के प्रति शीर्ष अधिकारियों के नकारात्मक रवैये से वह काफ़ी खिन्न हैं. सलाहकार के रूप में उनके सुझावों को नजरअंदाज किया जाता रहा. उनके साथ असहयोगात्मक रवैया रहा. हद तो तब हो गयी, जब विरोधियों ने उन्हें व्यक्तिगत तौर पर परेशान करना शुरू किया.
जिस गेस्ट हाउस में वह रह रहे हैं, उसे छोड़ने तक के लिए मजबूर कर दिया. शीर्ष स्तर से आदेश जारी कर उसके किराये में कई गुना वृद्धि करवा दी. डॉ गौतम की गिनती देश के जानेमाने ईमानदार आइपीएस अधिकारियों में होती है. बिहार की नीतीश सरकार ने उनकी बेदाग और प्रभावकारी छवि को देखते हुए अपने राज्यव्यापी सुधारात्मक अभियान के आरंभिक चरण में ही उन्हें डीजीपी का कार्यभार सौंपा था, जिसे गौतम ने बखूबी निभाया.
बिहार से सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के अनुरोध पर उन्होंने पिछले साल 16 जनवरी को यहां सुरक्षा सलाहकार का पद स्वीकारा था. लेकिन, 13 महीनों में ही वह निराश हो गये. कहते हैं पुलिस का एजेंडा होना चाहिए था जनहित, लेकिन यहां तो शीर्ष अधिकारियों का अपना-अपना एजेंडा है. पढ़िए डॉ डीएन गौतम से बातचीत.
-आपने सचमुच पद छोड़ने का मन बना लिया? क्यों?
*एक फ़िल्म का गाना है, वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा!
-वाह क्या खूब. फ़िर उस खूबसूरत मोड़ का क्या हुआ?
*हमने पूरी ईमानदारी से प्रयास किया, घर से दूर यहां बने रह कर. बहुत सारी ऊंच-नीच बरदाश्त करते हुए, जैसे, मीटिंग में मैंने कई सुझाव दिये. मीटिंग के बाद वही लोग लूज टॉक करते सुने गये. देखते हैं, क्या लागू होता है, हम करेंगे तब न होगा! किसी के सलाह देने से क्या होता है
-आखिर यह मानसिकता क्यों?
*दरअसल, उनका अपना-अपना एजेंडा है. वह उसी को पूरा करने में मगन हैं. कोई बाधा आये, उन्हें बरदाश्त नहीं करते.
-उनका एजेंडा क्या है?
*नहीं, मैं तो इतना ही बताऊंगा कि एजेंडा क्या होना चाहिए था. जैसे, मेरा एजेंडा था कि मैं ग्रासरूट पुलिसिंग में सुधार करूं, जिसे मैं उनके साथ शेयर नहीं कर पाया, तो हमारे लिए भूमिका यही रह जाती है कि हम घास छीलें.
-इसका मतलब, झारखंड में सुधार की गुंजाइश नहीं?
*नहीं, ऐसी बात नहीं. झारखंड के लोग सुखद परिवर्तन के हकदार हैं. मुझे वह अवसर मिला कि मैं उनके सपने को साकार करने का माध्यम बनूं. इसके लिए यहां की सरकार का शुक्रगुजार हूं. लेकिन मैं उस लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया (द्रवित भाव से).
-आप बहुत दुखी हैं?
*प्रसन्न होने का तो कोई कारण नहीं है! हां, बेहतरी होती, तो मुझे बहुत अच्छा लगता.
-मुझे जो जानकारी है, आप अपने सेवाकाल के आरंभ से सेवानिवृत्ति तक काफ़ी सफ़ल पुलिस अधिकारी रहे हैं. हालिया उदाहरण बिहार था. सभी का कहना है कि वहां आज हालात अच्छा है.
*(बीच में ही) हम वही तो सोचते हैं कि यहां (झारखंड में) वह सबकुछ एक महीने में हो जाता. यह बहुत बेहतर जगह है. यहां के लोग बहुत प्यारे हैं. अभी भी मैं कहता हूं यहां परिवर्तन में एक महीने से अधिक नहीं लगेगा. सचमुच खुशी का विषय नहीं है कि परिवर्तन की राह अवरुद्ध रह गयी.
-जाते-जाते आप झारखंड पुलिस को कोई संदेश देना चाहेंगे?
*झारखंड पुलिस, खासकर एसपी और उससे नीचेवाले रैंक के पुलिसकर्मियों के बारे में कहूंगा कि वे बेहतरीन लोग हैं. इनमें सारी क्षमता है. ये कुरबानियां दे रहे हैं, देश के लिए. अवाम के लिए काम कर रहे हैं. इन्हें बेहतर मान्यता मिलनी चाहिए. नेतृत्व इसका ख्याल करे कि ये लोग जितना खून-पसीना बहा रहे हैं, उसके बदले में उन्हें सही सराहना तो मिले. नेतृत्व के स्तर पर इसको लेकर जागरूकता नहीं है. नाहक इनका खून-पसीना बहता है. नाहक जान चली जा रही है और इनको (नीचे रैंक के पुलिसकर्मियों को) मैं यही कहूंगा कि आप जहां भी तैनात हैं, जनता के मित्र की तरह आचरण कीजिए. कभी भी‘युपेशनल आर्मी‘ (काबिज सेना) की तरह बिल्कुल ‘बिहेव‘ (आचरण) मत कीजिए. यहां बड़े प्यारे लोग हैं. मैंने तो देखा है यहां के लोगों को, थानेदार को भगवान की तरह मानते हुए.
श्री गौतम की ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा पर कोई भी उंगली नहीं उठा सकता, फिर मई उनके कुछ बैटन से असहमत हूँ. झारखण्ड में पुलिस प्रत्येक स्तर पर भ्रष्ट है. यह अलग बात है की उग्रवादिओं के कारण उनकी स्थिति थोड़ी डावाडोल हो जाती है वर्ना आम जनता के साथ उनका व्यवहार वहशियाना होता है. वे सिर्फ पैसों की भाषा जानते है और जिनसे पैसे नहीं मिल पाते उन निर्दोषों को झूठे मुकदमो में फंसा देते है.
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