सफ़लता के लिए न घबराएं न हड़बड़ाएं

आजकल के ज्यादातर युवा जिंदगी में हर कुछ बहुत जल्दी पा लेना चाहते हैं और इसके लिए वह अतिरिक्त मेहनत भी करते हैं. वहीं कुछ युवा ऐसे भी हैं, जो पाना तो हर कुछ चाहते हैं और वह भी समय से पहले, लेकिन मेहनत करने के नाम से दूर भागते हैं.

वह बस सफ़लता और उपलब्धियों का इंतजार करते हैं. इस उम्मीद में रहते हैं कि अवसर उनका दरवाजा बार-बार खटखटायेगी, बिना काम किये उपलब्धियों का खाता उनके नाम जुड़ेगा. यह सोच गलत है. सफ़लता के लिए लगातार मेहनत करनी पड़ती है. कभी असफ़ल भी हों, तो निराश न होते हुए आगे बढ़ते रहना होता है, तब तक, जब तक कि मंजिल न मिल जाये.

महज 12 साल का एक लड़का था और उसे उसके पिता ने एक आठ एमएम का कैमरा बतौर उपहार दिया, पर इस बच्चे ने अपनी कल्पनाशक्ति के बदौलत मात्र 16 साल की उम्र में ही 15 लघु फ़िल्में बना डाली थीं. इसी आठ एमएम के कैमरे से मात्र 500 डॉलर की बजटवाली अपनी पहली विज्ञान फ़िल्म बनायी -‘‘फ़ायर लाइट’’. इस महान निर्देशक का नाम है स्टीवन स्पीलबर्ग.

स्पीलबर्ग का जीवन इस बात का संदेश है कि प्रतिभा उम्र की न तो मोहताज होती है और न ही किसी बात का इंतजार करती है. अगर सही दिशा में मेहनत की जाये, तो हर व्यक्ति अपने मकसद में कामयाब हो सकता है. सिर्फ़ सत्रह साल की उम्र में ही स्पीलबर्ग ने स्टूडियो के चक्कर लगाने शुरू कर दिये. उनके सामने बहुत लंबा और संघर्षपूर्ण रास्ता था.

उन्होंने तय कर लिया था कि उन्हें कहां जाना है और इसके लिए किन रास्तों से होकर गुजरना है.इस दौरान वे लगातार वैसी चीजें सीखने में व्यस्त रहे, जो उनके काम को और बारीकी दे सकती थी. जो भी काम मिला उसमें उन्होंने अपना बेस्ट देने की कोशिश की. कई बार असफ़लता का मुंह देखना पड़ा. उनकी इन्हीं खासियतों ने उन्हें एक बेहतर फ़िल्मकार बनाया. लंबे संघर्ष के बाद वह घड़ी भी आयी, जिसका स्पीलबर्ग को इंतजार था.

उनकी फ़िल्म‘जॉ ’ की सफ़लता ने पूरी दुनिया को स्पीलबर्ग की प्रतिभा से परिचित करा दिया. टाइम मैगजीन ने स्पीलबर्ग को शताब्दी के सौ सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तियों में शामिल किया.कोई भी काम एक दिन में सफ़ल नहीं होता. दरअसल, यह तो एक पेड़ जैसा होता है. पहले इसके बीज आपको आत्मा में बोने पड़ते हैं, हिम्मत की खाद से इसे पोषित करना पड़ता है और मेहनत के पानी से इसे सींचना पड़ता है, तब जाकर वह सालों बाद फ़ल देने लायक होता है. सफ़लता के लिए इंतजार करना आना चाहिए और वह भी अपने प्रयास में कोई कटौती किये बगैर. सोच कर देखें कि 12 साल के स्पीलबर्ग उस कैमरे का कैसा यूज कर सकते थे और उन्होंने उसका इस्तेमाल किस तरह किया. बात छोटी है,पर है काम की.

बात पते की
-अपने प्रयासों में बगैर कटौती के सफ़लता का इंतजार करना सीखें.
-असफ़लता से निराश न हों, मंजिल की तरफ़ बढ़ते रहें.
-हर वह काम सीखने की कोशिश करें, जो आपके काम को बारीकी दे सकने की क्षमता रखता हो.

This Article Posted on: February 17th, 2012 in : Sections.

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