कांग्रेस से ज्यादा राहुल की हार-जीत से जुड़ता चुनाव!

।। नरेंद्र पाल सिंह ।।
अभी यूपी की राजनीति में आप जाति से हट कर बहुत दूर तक नहीं जा सकते. कांग्रेस को भी इससे अलग नहीं किया जा सकता. मुसलिम वोट को खींचने के लिए कांग्रेस लगातार इस समुदाय को लुभाने में लगी है. मुसलिम वोट में विधानसभा चुनाव की तुलना में लोकसभा चुनाव में आये 10 फ़ीसदी के उछाल से भी वह उत्साहित है.

बहरहाल, उसके रणनीतिकारों को यह बखूबी समझ आ रहा होगा कि जाति किसी चुनाव में एक बेहतर शुरुआत तो दे सकती है, लेकिन अकेले अपने बूते मंजिल तक नहीं पहुंचा सकती. यूपी में कांग्रेस का कोई मजबूत जमीनी संगठन नहीं है. यहां न तो कांग्रेस का कोई कैडर है, न ही बसपा और सपा की तरह चुनावी मशीनरी. बावजूद इसके अगर कांग्रेस प्रदेश की चुनावी राजनीति में लौटी दिख रही है तो इसे मुमकिन कर रहे हैं राहुल गांधी.

राहुल ने यहां कांग्रेस अभियान की कमान अपने हाथ में ले रखी है. मतदाता में कांग्रेस को लेकर बहुत भरोसा नहीं हो, लेकिन राहुल में एक उम्मीद देखता है. ‘वे मेहनत कर रहे हैं’, ‘कोशिश कर रहे हैं’. कोई कांग्रेस की तरफ़ झुक रहा हो या नहीं, लेकिन यह आवाज आप उत्तर प्रदेश के करीब-करीब हर हिस्से में सुन सकते हैं.

केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार का मुद्दा भी इस शोर में कहीं पीछे छूट गया है. गवर्नेस का मुद्दा सामने आ रहा है. खासतौर से युवा वोटर को वह अपील कर रहे हैं. इसे आप बांदा जिले में ही लालमणि सिंह वर्मा जैसे दलित युवक से लेकर नरेंद्र तिवारी के बयानों में पढ़ सकते हैं, ‘हम क्यों बुजर्गो के लिए वोट करें? हम किसी युवा नेता को ही क्यों न चुनें?’ इस चुनाव में लालमणि सिंह वर्मा और नरेंद्र तिवारी के उम्र के युवकों की एक बड़ी संख्या है.

2007 के विधानसभा और 2009 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को खंगालते हुए कांग्रेस राहुल के इर्द-गिर्द ही अपनी चुनावी रणनीति को अंजाम देने की कोशिश कर रही है. पिछली विधानसभा में कांग्रेस को मिले 8.6 फ़ीसदी वोट का ग्राफ़ लोकसभा में 18.3 फ़ीसदी तक जा पहुंचा था. यहां जिन हिस्सों में यह ग्राफ़ तेजी से बढ़ा, उनमें कांग्रेस अपनी ताकत झोंकती दिख रही है. खासतौर से अवध (11.5 से 34.3 फ़ीसदी), उत्तर-पूर्व (9 से 20.8 फ़ीसदी), रुहेलखंड (8.5 से 18.7 फ़ीसदी) और बुंदेलखंड (13.3 से 18.4 फ़ीसदी) में कई सीटों पर कांग्रेस बढ़त बनाती या मुकाबला करती दिखती है. पश्चिम (7.6 से 14.2 फ़ीसदी) में उसने राष्ट्रीय लोकदल से गठबंधन किया है.

लेकिन पूर्व की स्थिति इन सब से उलट है. पूर्व में विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बीच उसका ग्राफ़ ठहरा रहा था. यहां उसने लगता है कि खुद को मुकाबले से बाहर कर रखा है. जौनपुर, वाराणसी और संत कबीर नगर जिलों में कांग्रेस किसी चुनावी बहस का हिस्सा बनती नहीं दिखती. किसी खास उम्मीदवार पर जरूर चर्चा हो जाती है. मसलन बसपा और सपा का गढ़ कहे जाने वाले जौनपुर जिले में आपको शहर की सीट पर एनएसयूआइ के पूर्व अध्यक्ष नदीम जावेद या फ़िर आजमगढ़ जिले की मुबारकपुर सीट पर बनवारी लाल की बात करते लोग जरूर मिलेंगे.

कुछ खास हिस्सों में अपने को झोंकने के साथ-साथ कांग्रेस ने उन सीटों पर भी करीबी निगाह रखी है, जहां उम्मीदवार की अपनी लोकप्रियता और कामकाज जीत दिला सकती है. इस कड़ी में उसने पिछले चुनाव में बेहतर प्रदर्शन कर चुके निर्दलीय उम्मीदवारों पर भरपूर दांव लगाया है.

बांदा जिले की तिंदवारी सीट इसकी बढ़िया मिसाल है. यहां हर दूसरा मतदाता कांग्रेस उम्मीदवार दलजीत सिंह की बात करता मिल जायेगा, ‘आप उन्हें आधी रात फ़ोन कर सकते हैं, वे हाजिर हो जायेंगे.’ पिछले चुनाव में तिंदवारी की यह सीट 31 फ़ीसदी वोट से समाजवादी पार्टी के हक में गयी थी, निर्दलीय दलजीत सिंह 28 फ़ीसदी वोट के साथ दूसरे नंबर पर रहे थे. कांग्रेस उनकी लोकप्रियता को जीत में बदलने के लिए उन पर दावं आजमा रही है. ऐसा करते हुए वह बीते दो दशक में चुक गयी राजनीतिक ऊर्जा को इंपोर्ट भी कर रही है.

इन सब के बीच वापस लौटने का आभास कराती कांग्रेस के लिए क्या उम्मीदें हैं? चुनाव विश्‍लेषक संजय कुमार का कहना है कि अभी ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस के पास किसी एक खास वर्ग का वोट नहीं आ रहा. ब्राह्मण, दलित और मुसलिम सभी वर्गो का आंशिक वोट उसकी ओर आ रहा है. इसके फ़ायदा-नुकसान दोनों हैं. किसी एक खास वर्ग का वोट आपको किसी चुनाव में कामयाबी दिला सकता है, लेकिन जब छिटका तो बुरी तरह गिरा देगा. वहीं सभी वर्गो से वोट मिलने की सूरत में आपका वोट पूरे प्रदेश में एक सामान बंट जाता है. ऐसे में एक वक्त के बाद तीन-तीन चार-चार फ़ीसदी वोट बढ़ने के बाद ही सीटों में बड़ी बढ़ोतरी आ पाती है. ऐसे में जरूरी नहीं है कि आपका वोट प्रतिशत बढ़ जाने पर आपकी सीटों में भी उसी अनुपात में बढ़ोतरी हो.

कुल मिला कर, कांग्रेस के लिए पहली चुनौती लोकसभा के प्रदर्शन को बरकरार रखने की है. इस कोशिश में वह कहां तक पहुंचती है, इसकी धुरी राहुल गांधी के इर्द-गिर्द सिमटी है. यह चुनाव कांग्रेस की हार जीत से ज्यादा राहुल की हार-जीत से जुड़ गया है.
* कल भाजपा *

This Article Posted on: February 16th, 2012 in : Sections.

The commitment what Rahul is delivering regarding the development of the state is noticeable. one must understand that what had happend in U.P. for last 22 years is something which the state can not forget. the position of Uttar Pradesh which was considered as a good and educated state gone down.
Employment status declined like anything and the exploitation of the public by Mayawati gone up beyond words.
I think if people can understand the misery what they are suffering and if they can think about a prosprous state. They should attach themeselves with Rahul... for the better days to come

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