पूरी परीक्षा प्रणाली पर पुनर्विचार जरूरी

।। पंकज चतुर्वेदी ।।
बच्चों के बोर्ड के इम्तिहान सिर पर हैं. कहने को तो सीबीएसइ ने नंबर की जगह ग्रेड लागू कर दिया है, लेकिन इससे उस संघर्ष का दायरा और बढ़ गया है, जो बच्चों के आगे के एडमिशन, भविष्य या जीवन को तय करते हैं.

इस होड़ में किशोर अब भी पिस रहा है. कॉलेजों में दाखिले की मारामारी और हायर सेकेंडरी में पसंद के विषय लेने के लिए माकूल अंकों की दरकार का खेल भी जारी है. बल्कि अब तो बोर्ड के इम्तिहान से आगे की गलाकाट प्रतिस्पर्धा ज्यादा बड़ी हो गयी है

- हर बच्चा एआइइइइ, सीपीएमटी के अलावा अलग-अलग राज्यों के इंजीनियरिंग और मेडिकल इंट्रेंस एग्जाम की तैयारी में भी लगता है. बीबीए में दाखिला भी अलग परीक्षा से होना है. पाठ्यक्रम के दबाव के साथ-साथ अपने भविष्य और पालकों के अरमानों के दबाव को झेलने के लिए 17-18 साल की उमर कुछ कम ही होती है.

यही कारण है कि नारों से दमकती शिक्षा नीति ऐसी ’परीक्षा-प्रणाली‘ से सफ़लता की नहीं, असफ़ल लोगों की जमात तैयार कर रहा है. क्या किसी बच्चे की योग्यता, क्षमता और बुद्धिमता का तकाजा महज अंकों का प्रतिशत है? वह भी उस परीक्षा प्रणाली में, जिसकी स्वयं की योग्यता संदेहों से घिरी हो? यह सरासर नकारात्मक सोच है, जिसके चलते बच्चों में आत्महत्या, पर्चे बेचने-खरीदने की प्रवृत्ति, नकल व झूठ का सहारा लेना जैसी बुरी आदतें विकसित हो रही हैं. शिक्षा का मुख्य उद्देश्य इस नंबर-दौड़ में गुम होकर रह गया है.

छोटी कक्षाओं में सीखने की प्रक्रिया के नीरस होते जाने व बच्चों पर पढ़ाई के बढ़ते बोझ को कम करने के इरादे से मार्च 1992 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आठ शिक्षाविदों की एक समिति बनायी थी, जिसकी अगुआई प्रो यशपाल कर रहे थे.

समिति ने देश की कई संस्थाओं व लोगों से संपर्क किया और जुलाई 1993 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. उसमें लिखा गया था कि बच्चों के लिए स्कूली बस्ते के बोझ से बुरा है न समझ पाने का बोझ.

परीक्षा का वर्तमान स्वरूप आनंददायक शिक्षा के रास्ते में बड़ा रोड़ा है, अत इसके स्थान पर सामूहिक गतिविधियों को प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जाना चाहिए. सरकार ने सिफ़ारिशों को स्वीकार भी कर लिया और एकबारगी लगा कि उन्हें लागू करने के लिए भी कदम उठाये जा रहे हैं.

फ़िर देश की राजनीति मंदिर-मसजिद जैसे विवादों में ऐसी फ़ंसी कि उस रिपोर्ट की सुध ही नहीं रही. बीते एक दशक में कक्षा में अव्वल आने की गलाकाट में न जाने कितने बच्चे कुंठा का शिकार होकर मौत को गले लगा चुके हैं. फ़िर भी, अपने बच्चे को पहले नंबर पर लाने के लिए कक्षा एक-दो में ही पालक युद्ध सा लड़ने लगते हैं.

दूसरी सिफ़ारिश पाठ्य पुस्तक के लेखन में शिक्षकों की भागीदारी बढ़ाकर उसे विकेंद्रित करने की थी. सभी स्कूलों को पाठ्य पुस्तकों और अन्य सामग्री के चुनाव सहित नवाचार के लिए बढ़ावा दिये जाने की बात भी रपट में थी.

अब प्राइवेट स्कूलों को अपनी किताबें चुनने का हक तो मिल गया है, लेकिन यह बच्चों के शोषण का जरिया बन गया है. पब्लिक स्कूल अधिक मुनाफ़े की फ़िराक में बच्चों का बस्ता भारी करते जा रहे हैं.

सरकार बदलने के साथ किताबें बदलने का दौर एनसीइआरटी के साथ-साथ विभिन्न राज्यों के पाठ्य पुस्तक निगमों में भी जारी हैं. पाठ्य पुस्तकों को स्कूल की संपत्ति मानने व उन्हें बच्चों को रोज घर ले जाने की जगह स्कूल में ही रखने के सुझाव न जाने किस लाल बस्ते में बंध कर गुम हो गये.

कुल मिलाकर परीक्षा प्रणाली और उसके परिणामों ने एक भयावह सपने, अनिश्चितता की जननी तथा बच्चों के नैसर्गिक विकास में बाधा का रूप ले लिया है. कहने को तो अंक सूची पर प्रथम श्रेणी दर्ज है, लेकिन उसकी आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूलों ने भी दरवाजों पर शर्तो की बाधाएं खड़ी कर दी हैं.

सवाल यह है कि शिक्षा का उद्देश्य क्या है- परीक्षा में स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना, विषयों की व्यावहारिक जानकारी देना या फ़िर एक अदद नौकरी पाने की कवायद? निचली कक्षाओं में नामांकन बढ़ाने के लिए सर्व शिक्षा अभियान और ऐसी ही कई योजनाएं संचालित हैं.

सरकार हर साल अपनी रिपोर्ट में ’ड्रॉप आउट‘ की बढ़ती संख्या पर चिंता जताती है, लेकिन कभी किसी ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि अपने पसंद के विषय या संस्था में प्रवेश न मिलने से कितनी प्रतिभाएं कुचल दी गयी हैं.

मामला यहीं नहीं रुकता है, बच्चे को 12वीं पास करने के एवज में मिला प्रमाणपत्र उसकी उच्च शिक्षा की गारंटी भी नहीं लेता हैं. डिग्री कालेजों में ऊंचे नंबर पाने वालों की ही लिस्ट तैयार होती है.

अनुमान है कि हर साल हायर सेकेंडरी (राज्य या केंद्रीय बोर्ड से) पास करने वाले बच्चों का 40 फ़ीसदी आगे की पढ़ाई से वंचित रह जाता है. ऐसे में परीक्षा की पूरी प्रक्रिया और उसके बाद के नतीजों को बच्चों के नजरिये से तौलने-परखने का वक्त आ गया है.
( लेखक नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया में सहायक संपादक हैं )

This Article Posted on: February 6th, 2012

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
Image CAPTCHA
Enter the characters shown in the image.