आमने-सामने
अभी सिर्फ सलाहकार की भूमिका निभा रही है जिला परिषद
  • Sep 21 2013 11:57AM
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त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में जिला परिषद सबसे ऊपरी पंचायत है.  इसकी भूमिका एक अभिभावक की तरह है.  सरकार ने नौ विभागों के अधिकार पंचायतों को हस्तांतरित किये हैं.  लेकिन, जिला परिषद सदस्यों की भी यही शिकायत है कि बाकी पंचायतों की तरह उनलोगों को भी पर्याप्त अधिकार नहीं दिये गये हैं. इसलिए पदाधिकारी उन्हें महत्व नहीं देते हैं. 

जनता का काम नहीं हो पाता है.  ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि जिला प्रशासन व जिला परिषद के बीत सेतु की भूमिका निभाने वाले उपविकास आयुक्त कैसे संतुलन बनाते हैं और उनका नजरिया क्या है. ध्यान रहे उपविकास आयुक्त ही जिला परिषद के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी व सचिव भी होते हैं. पंचायतनामा के लिए देवघर के डीडीसी सह जिप के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी व सचिव शशिरंजन प्रसाद सिंह से उमेश यादव ने खास बातचीत की. प्रस्तुत है प्रमुख अंश :

जिला परिषद के मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी की हैसियत से काम करने का अनुभव बताएं?
जिला परिषद के साथ अच्छा अनुभव रहा है़ जिला परिषद देवघर ने सामान्यत: सभी विषयों एवं बिंदुओं पर सकारात्मक रुख अख्तियार किया है़  एक-दो हल्के-फुल्के मामलों को छोड़ दिया जाय तो किसी प्रकार के विवाद या तनाव की बात नहीं है.  जिला परिषद के साथ मेरा और अन्य पदाधिकारियों के संबंध अन्य जिलों की अपेक्षा अच्छा एवं तालमेल वाला रहा है.

त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में जिला परिषद गाजिर्यन है. लेकिन, परिषद यह काम नहीं कर पा रही है. इसके क्या कारण हैं.
जिला परिषद अपना प्रभाव नहीं दिखा पा रही है, इसके कई कारण हैं. सबसे पहले परिषद का जो स्वरूप है और उसमें जो कार्य है, वह उसे या तो नहीं दी गयी है या आधी-अधूरी दी गयी है. जिला परिषद के लिए व्यवस्था उपलब्ध नहीं है. वर्तमान स्थिति में परिषद सिर्फ सलाहकार के रोल में है. बैठकें की जाती हैं, योजनाओं का प्रस्ताव पारित किया जाता है, शिकायतें ली जाती हैं, जांच करायी जाती है आदि-आदि.  जिस तरह की योजनाएं पास की जाती हैं उसमें से कुछ पर ही कार्य हो पाता है.  दूसरा कारण है कि जिला परिषद के सदस्यों का समुचित प्रशिक्षण नहीं हुआ है.  इसके लिए सरकारी व्यवस्था नहीं है.

जिला परिषद को अपनी भूमिका निवर्हन में दिक्कत कहां आती है. क्या व्यवस्था होनी चाहिए़
जिला परिषद में 50 प्रतिशत रिजर्वेशन के कारण अधिकतर महिला जनप्रतिनिधि चुनकर आयी हैं जो किसी कार्य में सक्रिय भागीदारी निभाने के लिए तत्पर नहीं रहती हैं.  वे शुरू से ही घरेलू महिला रही हैं. सामान्यत: उनकी जीत उनकी नहीं बल्कि उनके पतियों की है.  इसलिए वे सिर्फ मुखौटा बनकर रह गयी हैं, अप्रभावी हो गयी हैं.  वस्तुत: आरक्षण फेज वाइज लागू करने से ज्यादा फायदा होता. लेकिन, यह सरकार का फैसला है. 

खैर यह पहला चुनाव था. दूसरे चुनाव में त्रिस्तरीय व्यवस्था बदलने की उम्मीद है. सभी ने देख लिया है कि पंचायती राज व्यवस्था क्या है, किस रूप में काम करना है. कंपिटीशन का समय है, ज्यादा सक्रिय प्रतिनिधि चुन कर आयेंग़े  यह तो थी महिला प्रतिनिधियों की बात है. पुरुष प्रतिनिधियों में भी अधिकतर की सक्रिय भागीदारी कम ही रहती है. क्योंकि वे डरते हैं. डीसी या डीडीसी की तो छोड़िये पंचायती राज के पदाधिकारियों और प्रखंड स्तर के पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों से डरते हैं. इस मानसिकता को मैंने तोड़ने का प्रयास किया है.  पंचायत प्रतिनिधि किसी से न डरें और डीसी एवं डीडीसी से खुलकर शिकायत करें.   इसके लिए मैं हमेशा कहता रहता हूं. प्रखंडों में जा-जाकर भी कहा कि आप पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों से डरिये मत, शिकायत करिये एवं अपनी समस्या बताइय़े  लेकिन, इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा है.  सामान्यत: पंचायत प्रतिनिधि उन्हीं मामलों में शिकायत करते हैं, जहां उनका निजी हित प्रभावित होता है.

और कौन-कौन सा अधिकार है जो जिला परिषद को मिलना चाहिए़
सरकार को जिला परिषद को सभी अधिकार देना चाहिए़  अभी जो अधिकार दिये गये हैं, वे सभी तरह से व्यावहारिक नहीं हैं.  घुमा-फिरा कर दिये गये हैं. सभी विभागों में सिर्फ समीक्षा एवं अनुश्रवण की ही शक्ति दी गयी है जो शक्ति जिला परिषद में मौलिक रूप से अंतर्निहित है.  किसी प्रकार की सुधारात्मक, दंड देने, स्थानांतरण एवं प्रोन्नति की शक्तियां नहीं दी गयी है.  यह अधिकार अभी भी सरकार या पदाधिकारियों के पास सुरक्षित है. ऐसी स्थिति में जिला परिषद को जो अधिकार दिये गये हैं वे प्रभावशाली नहीं हैं.  यह शिकायत पंचायत प्रतिनिधि भी बराबर करते आ रहे हैं.  उदाहरण स्वरूप समाज कल्याण विभाग में महिला पर्यवेक्षिका या सीडीपीओ के स्थानांतरण या उनके विरुद्घ कार्रवाई का ठोस अधिकार जिला परिषद को नहीं दिया गया है.

जिला परिषद की बैठकों में लिये गये निर्णय पर अमल नहीं होता है?
जिला परिषद की बैठकों में जो निर्णय होते हैं उसमें 70 से 80 प्रतिशत मामले कार्यान्वयन के नहीं होते हैं. अधिकतर जांच या स्वीकृति के संबंध में निर्णय होते हैं. जांच की स्थिति यह है कि पदाधिकारी या व्यवस्था की कमी और व्यवस्तता के कारण 25 प्रतिशत मामले में ही कार्रवाई हो पाती है.  इसलिए अधिकतर मामले लंबित रह जाते हैं. दूसरी बात यह है कि त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में अधिकतर जांच के लिए प्रस्ताव पारित किये जाते हैं जो प्रशासन की क्षमता से ज्यादा होता है.

बैठकों में लिये गये निर्णय पर अमल हो, इसके लिए क्या व्यवस्था होनी चाहिए ?
इसके लिए जिला स्तर पर जांच के लिए एक अलग सेल, पदाधिकारी एवं सुविधाएं होनी चाहिए़  देवघर जिले में वर्तमान में 10 हजार योजनाएं संचालित है. पंचायत प्रतिनिधियों की संख्या चार हजार के आसपास है. ऐसे में हर दिन 25 से 50 आवेदन जांच के लिए आ ही जाते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि इसकी जांच कौन करेंग़े  कई बार ऐसा होता है कि जांच करायी जाती है. लेकिन, जांच ठीक से नहीं होती है. जांच करने वाले ही लीपापोती कर देते हैं. अधिकतर मामलों में जांच पदाधिकारी परिवादकर्ता एवं संबंधित सभी लोग घालमेल कर शिकायत को ही गलत साबित कर देते हैं. ऐसी स्थिति में शिकायत या जांच को महत्व देने की जरूरत नहीं है.

विकास कार्यो में पंचायत प्रतिनिधियों से क्या अपेक्षाएं हैं?
पंचायत प्रतिनिधियों से कोई अपेक्षा रखने की संभावना नहीं है. पदाधिकारियों से अपेक्षा मुश्किल है तो पंचायत प्रतिनिधि से ठोस आशा नहीं ही की जा सकती है. पिछले दो सालों से मैंने देवघर जिले में प्रखंड स्तर पर जाकर लिखित एवं मौखिक रूप में बच्चों की तरह समझा-बुझा कर पंचायत प्रतिनिधियों से कहा कि किसी प्रकार की दिक्कत, गड़बड़ियों आदि में पदाधिकारी एवं कर्मचारी का सहयोग नहीं मिले, बात नहीं सुनें एवं बहाना बनाया जाये तो मुझसे मिलकर या मोबाइल पर शिकायत करें, मुझें समस्या बताएं.  लेकिन कोई पंचायत प्रतिनिधि  कठिनाई या समस्या में पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों के असहयोग की बात को लेकर हमें सूचित नहीं करता है.  इतना ही नहीं पंचायत प्रतिनिधि, रोजगार सेवक, पंचायत सेवक, कनीय अभियंता आदि को गलत कार्य करते पाये जाने पर बचाने का प्रयास करते हैं.  इसके साथ ही बिना मांगे एक-दो मुखिया ने स्पष्टीकरण पूछ कर सर्टिफिकेट दिया कि अमुख मामले में रोजगार सेवक की गलती नहीं है.  इसलिए मुङो किसी पंचायत से कोई अपेक्षा नहीं है. जिला परिषद में 50 प्रतिशत रिजर्वेशन के कारण अधिकतर महिला जनप्रतिनिधि चुनकर आयी हैं जो किसी कार्य में सक्रिय भागीदारी निभाने के लिए तत्पर नहीं रहती हैं.

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