उत्कृष्टता की उड़ान हमेशा एक दिलचस्प कहानी की शक्ल में सामने आती है. हम इस कहानी के हर एक पन्ने को बेहद बारीकी से पढ़ना और समझना चाहते हैं. उसमें डूब कर जीना चाहते हैं. आज फ़िर एक ऐसी ही कहानी हमारे सामने साकार हो रही है. इस कहानी के लिए  हम शुक्रगुजार हैं, सायना नेहवाल के. भारतीय खेलों में नया इतिहास रचती सायना नेहवाल. हर गुजरते दिन के साथ एक नयी कामयाबी और उस कामयाबी के साथ एक नयी कहानी. भारतीय बैडमिंटन की इस सबसे बड़ी नायिका ने महज तीन हफ्ते में तीन अंतरराष्ट्रीय खिताब अपने नाम करते हुए पूरे देश को एक नये स्वाभिमान से सराबोर कर दिया है. हम सब इस खुशी में डूबे हैं. सायना की कामयाबी के मायने आप इस पहलू में समझ सकते हैं कि उन्होंने फ़ुटबॉल वर्ल्डकप के जुनून को भी कुछ देर के लिए पीछे धकेल दिया है. महेंद्र सिंह धौनी की टीम को ऐशया कप में 15 साल के इंतजार के बाद मिली कामयाबी भी वो काम नहीं कर सकी जो सायना नेहवाल की इस उपलब्धि ने कर दिखाया.       
 
महज 20 साल की सायना नेहवाल कामयाबी के जिस नये शिखर पर खड़ी हैं, उसके आसपास कुछ गिनेचुने भारतीय एथलीट ही पहुंच सके हैं. इस मोड़ पर हमें याद आती है उड़न परी पीटी ऊषा. वो हमें इतिहास में 25 साल पीछे लौटा ले जाती हैं. वह 1985 का साल था. जब पीटी ऊषा ने जकार्ता में हुई ऐशयाई ट्रेक एंड फ़ील्ड में पांच गोल्ड और एक सिल्वर मैडल हासिल किया था. अपने इसी सिलसिले को बरकरार रखते हुए ऊषा ने अगले साल सियोल ऐशयाइ खेलों में चार गोल्ड और एक सिल्वर मैडल अपने नाम किये थे. आज सायना पीटी ऊषा कीउस सुनहरी कामयाबी के करीब आ खड़ी हुई हैं.       
 
दरअसल परी कथा की तरह आगे बढ़ते सायना नेहवाल के इस सफ़र की सबसे बड़ी धुरी उनका लगातार अपने जीत केसिलसिले को बरकरार रखना है. दो साल पहले बीजींग ओलंपिक खेलों के क्वार्टर फ़ाइनल में पहुंचने के बाद से सायना करीब-करीब हर बड़ी प्रतियोगिता के ओखरी आठ में जगह बनाने में कामयाब रही हैं. उन्होंने ज्यादातर इससे आगे का ही सफ़र तय किया है. सायना की कोशिशों को हम कोर्ट पर उनके प्रदर्शन से जोड़कर ही देख पाते हैं. उनकी हार और जीत के साथ एक आम भारतीय खेल प्रेमी की भावनाएं शक्ल लेती हैं. लेकिन वे इन कामयाबियों के पीछे छिपी उनकी कड़ी मेहनत तक नहीं पहुंच पाते. सायना की उन कोशिशों को नहीं पढ़ पाते, जो उन्हें एक चैंपियन में ढाल रही हैं. यह कहना कतई गलत नहीं होगा कि सायना एक सहज और सामान्य जिंदगी को दरकिनार कर एक सन्यासी की तरह अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही हैं. यह लक्ष्य एक टाइटल नहीं है. एक शिखर भर नहीं है. यह अपने खेल को परिपूर्णता में तब्दील करने की कोशिश है. उसे पूरी तरह जीने की कोशिश है. 20 साल की सायना अपनी हमउम्र लड़कियों की तरह सामान्य जिंदगी नहीं जी सकती, लेकिन बैडमिंटन के कोर्ट पर अपने सपनों को साकार करने के लिए यह एक छोटी-सी कीमत है, जो सायना को चुकानी है. सायना की उपलब्धियों ने देश के हजारों नौजवानों में ऐसे ही ख्वाब के बीज बो दिये हैं. सायना की ये कामयाबियां उन्हें बैडमिंटन कोर्ट के दायरे से बाहर ले गयी हैं. इस परीकथा में तब्दील होती कहानी का पहला पन्ना सायना ने नहीं उनके माता-पिता ने लिखा. अगर उसके माता-पिता सायना से जुड़े इस ख्वाब की खातिर हिसार को छोड़ कर हैदराबाद में नहीं बसते, तो सायना भी लाखों लड़कियों की भीड़ में शामिल होकर रह जाती. उनके पिता हरबीर सिंह और मां ऊषा नेहवाल ने बैडमिंटन की इस दुनिया में सायना को बुलंदियां छूने के लिए हैदराबाद का माहौल दिया. उन्होंने खुद अपनी जिंदगी को सायना की जरूरतों के मुताबिक ढाल लिया.       
 
उन्होंने उसे शुरुआत में नानी प्रसाद के पास कोचिंग के लिए भेजा और फ़िर मशहूर कोच एसएम आरिफ़ की निगरानी में छोड़ दिया. इसके बाद ऑल इंग्लैंड चैंपियन पुलेला गोपीचंद ने उन्हें अपने अनुभव से हासिल तकनीकी बारिकियों से रू-ब-रू कराया. साथ ही दिया वह हौसला, जिसके चलते सायना बड़े से बड़े दिग्गज के सामने कभी कमजोर नहीं पड़ती. फ़िर हार जीत को लेकर भी सायना का नजरिया बहुत दिलचस्प है- मैं एक खिलाड़ी हूं. मुङो हार और जीत दोनों से गुजरना होगा. वह अक्सर कहती हैं आप लगातार जीत नहीं सकते, लेकिन अगर आप एक बार हारते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप दोबारा जीत नहीं सकते. मैं खेल को इसी नजरिये से देखती हूं. मिसाल के लिए चीनी लड़कियों को ही देखिए. वे बहुत अधिक टूर्नामेंट नहीं खेलतीं और आप सभी को , सभी टूर्नामेंट खेलते नहीं देख सकते. इसलिए हर बार आपको एक नयी चुनौतियों से रू-ब-रू होना पड़ता है. सायना अपने वक्त का बेहतरीन उपयोग करना जानती हैं. अगर आप मानसिक दृढ़ता की बात करें तो हैरानी होती है कि कैसे इतनी कम उम्र में वो उम्मीदों के इन दबावों को सहन कर पाती हैं. उन्होंने एक बार मुझसे कहा था- मैं बार बार अपने को यह एहसास कराती रहती हूं कि मैं एक सामान्य लड़की हूं. मैं इस अहसास को दूर रखना चाहती हूं कि मैं एक चैंपियन हूं. यह आसान काम नहीं है लेकिन उम्मीदों के इस दबाव को दूर रखने के लिए मुङो खुद को इस सोच से भरना जरूरी है. मेरा पूरा ध्यान कड़ी मेहनत करने और सौ फ़ीसदी फ़िट रहने पर रहता है. अगर आप फ़िट हो तो आप दबाव महसूस नहीं करोगे. अगर आपने सही तैयारी नहीं की है तो आप खुद ब खुद दबाव महसूस करने लग जायेंगे.       
 
यही मुङो पिछले इंडोनेशियन ओपन के बाद सायना से की गई मुलाकात याद आ रही है. मैंने उनसे पूछा था कि कब हम उन्हें शिखर पर देख सकते हैं. उनका जवाब था मैं सीधे सीधे पहले पायदान पर नजर ग़ड़ाये नहीं हूं.  मैं टॉप फ़ाइव में पंहुचना चाहती हूं फ़िर टॉप थ्री में इसके बाद ही मैं नंबर एक के बारे में सोचूंगी. जानती हूं यह एक बड़ा लक्ष्य है. इसके लिए मुङो लगातार बड़े टूर्नामेंट में जीत दर्ज करनी होगी. मैं महसूस कर रहा था कि वो किस तरह से सीढ़ी दर सीढ़ी अपने सपने को साकार करने में लगी हैं. 1977 की जनवरी में मॉर्तिना नवरातिलोवा ने टेनिस कोर्ट पर ऐसी कामयाबी दर्ज की थी. उन्होंने अमेरिका में वाशिंगटन, ह्यूस्टन और मिनोपोलिस में तीन लगातार टूर्नामेंट जीते थे. हम सभी जानते हैं कि इसके बाद मार्तिना ने टेनिस की दुनिया में किन बेमिसाल ऊंचाइयों को छुआ था. सायना भी कुछ आज ऐसी ही सुनहरे शिखर की दहलीज पर खड़ी हैं. लेकिन सायना न तो शिखर को लेकर बेचैन हैं न ही नतीजो को लेकर. वो अपने खेल को पूरी तरह डूब कर जी रही हैं. हम सबके लिए उत्कृष्टता की एक और नयी कहानी को सामने लाते हुए.
 
(लेखक वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं) |