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गुजरात में सौराष्ट्र की मांग
  • Aug 3 2013 12:00AM
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 ।। प्रो हरि देसाई ।।

(गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार)

- भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार माने जा रहे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह प्रदेश में भी शुरू हुई अलग सौराष्ट्र राज्य की मांग कई कारणों से हैरान करती है. -

पहले भाषाई प्रांत आंध्र प्रदेश का विभाजन कर अलग तेलंगाना राज्य के गठन के कांग्रेस और यूपीए के फैसले के बाद देश के अन्य हिस्सों में भी कई नये प्रदेशों की मांगें जोर पकड़ने लगी है. कहीं से बंद, कहीं से विरोध प्रदर्शन तो कहीं से हिंसा तक की खबरें रही हैं. लेकिन अलग राज्य की इन मांगों के बीच भाजपा की ओर से अगले प्रधानमंत्री पद के दावेदार माने जा रहे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह प्रदेश में भी शुरू हुई अलग सौराष्ट्र राज्य की मांग कई कारणों से हैरान करती है.

विशाल समंदरतटवाले सौराष्ट्र प्रदेश की एक अलग पहचान है. सोमनाथ और द्वारका जैसे आस्था के स्थानों के अलावा भारतीय इतिहास में भी उसका विशेष महात्म्य रहा है. कभी अंगरेज शासन के दौरान और उसके अंतिम दिनों में अखंड भारत के शिल्पी सरदार वल्लभभाई पटेल को समग्र देश के 562 रजवाड़ों में से अकेले सौराष्ट्र के 222 रजवाड़ों को भारतीय संघ प्रदेश से जोड़ने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ी थी.

कभी भारत के राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपिता मोहम्मद अली जिन्नाह के पैतृक गांव इसी सौराष्ट्र प्रदेश में हुआ करते थे. सरदार पटेल के साथ अभियान में शरीक होने से पूर्व कभी यहां के प्रभावी राजवी जाम साहब कायदेआजम मोहम्मद अली जिन्नाह के साथ पाकिस्तान के गठन में सहयोग करने हेतु उत्साह दिखाते थे. एक बार भावनगर के प्रजावत्सल राजवी महाराजा कृष्ण कुमार सिंहजी ने अपने राज्य को गांधीजी के चरण में समर्पित कर दिया, तो छोटे-बड़े रजवाड़ों के शासकों का नेतृत्व करनेवाले नवानगर के राजवी जाम साहब भी जिन्नाह के मंसूबों की तौहीन कर सरदार पटेल के कैंप में शरीक हो गये.

स्वतंत्रता के बाद भी कभी सौराष्ट्र अलग राज्य हुआ करता था. उसके मुख्यमंत्री यूएन ढेबर की सादगी और प्रजावत्सल शासन के चर्चे देशभर में थे. 1960 में मुंबई राज्य का विभाजन हुआ और अलग गुजरात बना. सौराष्ट्र और कच्छ, दोनों का गुजरात में विलय हुआ. सौराष्ट्र के राजनेता पूरे गुजरात के मुख्यमंत्री बनते रहे. लेकिन जब मुख्यमंत्री पद प्रदेश के अन्य हिस्से में गया तो सौराष्ट्र को अन्याय की अनुभूति होने लगी.

सौराष्ट्र से गुजरात को मिले मुख्यमंत्रियों में जीवराज मेहता, बलवंतराय मेहता और केशुभाई पटेल शामिल हैं. कच्छ से सुरेश मेहता भी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे हैं. सौराष्ट्र राज्य के मुख्यमंत्री यूएन ढेबर तो अखिल भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे हैं. कच्छ में आज भले ही विकास रफ्तार पर हो, लेकिन वहां की जनता को अन्याय एवं विकास के अभाव की अनुभूति करानेवाले राजनेता और पूर्व राजवी परिवार के सदस्य केवल कच्छ, बल्कि मुंबई से भी सक्रिय रहे हैं. सरहद प्रदेश होने के कारण कच्छ को अलग राज्य का दर्जा देना जोखिम-भरा माना जाता रहा है, लेकिन कभी दिल्ली से सीधा शासित होनेवाले कच्छ राज्य को आज भी अलग राज्य बनाने के स्वप्न देखनेवाले मौजूद हैं.

तेलंगाना के गठन की घोषणाओं के साथ ही सौराष्ट्र के नवनिर्वाचित भाजपाई सांसद विठ्ठल रादड़िया अलग सौराष्ट्र-कच्छ राज्य की मांग को लेकर मैदान में कूद पड़े हैं. वैसे तो सौराष्ट्र के प्रभावी पटेल समाज में अच्छी पैठ रखनेवाले रादड़िया कांग्रेसी सांसद के रूप में पहले भी अलग सौराष्ट्र राज्य की मांग उठाते रहे हैं, किंतु उन्हें शायद ही किसी ने गंभीरता से लिया हो.

कांग्रेस से निर्वाचन के पश्चात संसद से इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के निकटस्थ साथी के नाते भाजपा के टिकट पर रादड़िया पुन: लोकसभा पहुंचे हैं. उनके दोनों बेटों ने भी कांग्रेस का दामन छोड़ कर भाजपागमन किया है. सहकार क्षेत्र में काफी प्रभाव रखनेवाले रादड़िया बाहुबली नेता माने जाते हैं.

आश्चर्य केवल इस बात का है कि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बनने की होड़ में शामिल हैं, ऐसे समय में रादड़िया ने अलग सौराष्ट्र-कच्छ राज्य का नारा क्यों बुलंद किया है? वैसे भी पिछले वर्षो में अलग सौराष्ट्र राज्य के लिए मांग उठी तो विठ्ठल रादड़िया शायद ही कभी उसका नेतृत्व करते थे. इस अलग राज्य की मांग कभी किसी जनआंदोलन में परिवर्तित नहीं हुई- केवल कुछेक नेताओं की बैठकों एवं मीडिया निवेदनों तक ही वह सीमित रहती आयी है.

सौराष्ट्र के पटेल समाज से संबंध रखनेवाले नेता विठ्ठल रादड़िया की अलग सौराष्ट्र राज्य की मांग नरेंद्र मोदी से सलाह-मशविरा करने के बाद उठायी गयी है या अपने-आप, यह बात जब तक स्पष्ट नहीं हो जाती, विठ्ठल रादड़िया के इरादों को समझना मुश्किल है. लेकिन कहा जा सकता है कि इस समय अलग राज्य की मांग पूरे सौराष्ट्र में वोटबैंक और मनी-मसल पावर से मुख्यमंत्री पद की कुर्सी तक पहुंचने की रादडिया की चाहत से प्रेरित हो सकती है.

वैसे भी कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में आये रादड़िया के बेटे जयेश रादड़िया को गुजरात में मंत्रीपद अब तक नहीं मिला है. साथ ही भाजपा के संगठन में हुई नियुक्तियों में भी रादड़िया का प्रभाव नजर नहीं आता है. इसलिए संभव है कि कभी पूर्व मुख्यमंत्री शंकरसिंह वाघेला के साथ भाजपा एवं राजपा के माध्यम से कांग्रेस का दामन थामनेवाले रादड़िया को अब लगने लगा हो कि उन्हें अपनी जमीन स्वयं ही तलाशनी होगी.

आनेवाले दिनों में सौराष्ट्र-कच्छ या फिर अलग-अलग सौराष्ट्र और कच्छ राज्य के गठन की मांग को लेकर होनेवाली संभावित गतिविधियों पर नजर रखना होगा. सौराष्ट्र राज्य की मांग के गुब्बारे में से हवा निकालने में राजधानी गांधीनगर के मुखिया कितने सक्रिय होते हैं, उस पर इसका भविष्य निर्भर है. वैसे भी उत्तर गुजरात के वड़नगर में पैदा हुए मोदी वर्तमान में गुजरात के अधिपति हैं और पीएम पद के सपने  संजोये हैं, तब उनकी राह में कंटक बिछाने का काम शायद ही कोई गुजराती नेता करेगा, उसमें भी उनकी अपनी ही पार्टी का नेता तो यह कर ही नहीं सकता.

रादड़िया से पहले भी कुछेक विधायक एवं पूर्व मंत्री अलग सौराष्ट्र के लिए आवाज उठाते रहे हैं. उनमें पूर्व मंत्री मनसुख जोशी का विशेष उल्लेख किया जा सकता है. सौराष्ट्र ऑयल मिलर्स एसोसिएशन (सोमा) के नेता के नाते कभी उकाभाई पटेल अलग सौराष्ट्र की मांग करते रहे हैं, किंतु उसे सौराष्ट्र की ऑयल लाबी की मांग मानी जाती थी.

पूर्व राजपूत राजवी अपनी राजनीतिक अपेक्षाओं की पूर्ति हेतु कभी सौराष्ट्र राज्य की मांग दोहराते थे, किंतु मोदीयुगीन सौराष्ट्र के अधिकतर पूर्व राजवी परिवारों के राजकुमार राजनीति व्यवसाय के मद्देनजर भाजपा के साथ रहने में अपना हित समझते हैं. ऐसे में राजपूत और पटेल समाज के बीच की दरार अलग सौराष्ट्र की मांग को प्रभावी बना सकती है. लेकिन गुजरातियों की वर्तमान पीढ़ी राजनीतिक संघर्ष की अपेक्षा राजनीतिक एवं आर्थिक लाभ बटोरने में विशेष रुचि रखती है. अत: आनेवाले दिनों में गुजरात के पुन: विभाजन की संभावना कम ही दिखती है.

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