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  • Jul 26 2013 2:56AM

आप लोगों को स्वीकारें वे आपको स्वीकार करेंगे

आप लोगों को स्वीकारें वे आपको स्वीकार करेंगे

 ।।दक्षा वैदकर।।
बचपन से मिलनेवाली जानकारियां ही हमारे विचार बनाती हैं और वो सारे विचार ही हमारा व्यक्तित्व बनाते हैं. क्योंकि हर व्यक्ति अलग-अलग माहौल में पैदा होता है, अलग परिस्थितियों में पलता है, अलग तरह की कठिनाइयां उसकी जिंदगी में आती हैं, अलग तरह के लोग उसके आसपास होते हैं, इसलिए उसके विचार भी अलग बनते हैं. किसी भी इनसान से उम्मीद करना कि उसके और मेरे विचार एक जैसे होने चाहिए, बेवकूफी है. आपके कुछ विचार आपस में मिल सकते हैं, लेकिन सभी विचार मिलना नामुमकिन है. इसलिए रिश्ता चाहे जो भी हो. पति-पत्नी का हो, बॉस-कर्मचारी का हो या सास-बहू का हो. आपस में विचार कभी नहीं मिलेंगे.

सोचनेवाली बात है कि जब एक ही परिवार के दो सदस्यों, उदाहरण के तौर पर मां-बेटी के विचार, आदतें आपस में नहीं मिलतीं, तो हम दूसरे घर की बेटी को कैसे अपने परिवार में ढलने को कहते हैं? कई बार हम देखते हैं कि बेटी देर से सो कर उठती है, खाना अलग तरह से बनाती है, टेबल अलग तरह से सजाती है, गुस्सा करती है, कपड़े बिखेर कर रखती है. मां उस पर चिल्लाती जरूर है, लेकिन वह बेटी से नफरत नहीं करती है. ऐसा इसलिए, क्योंकि यहां दोनों के बीच का संबंध बहुत गहरा है. वह उसकी सारी कमियों, अंतर को स्वीकार कर लेती है, क्योंकि वह उनकी बेटी है. लेकिन जब ये सारी आदतें बहू की होती हैं, तो वह मां बरदाश्त नहीं कर पाती. वह उम्मीद करती है कि बहू मेरे जैसा ही व्यवहार करे.

आपने पशु प्रेमियों को तो देखा ही होगा. उनके यहां अगर अलग-अलग नस्ल के कुत्ते होते हैं. जब उनसे कभी मिलते हैं, तो वे हमें बताते हैं कि मेरे इस कुत्ते का व्यवहार गुस्सैल है, किसी को भी काट सकता है. इसकी नस्ल ही ऐसी है. मेरा दूसरा कुत्ता फलां नस्ल का है इसलिए वह बहुत शांत है. हम सभी कुत्ताें में अंतर होने के बावजूद भी उनसे समान प्रेम करते हैं, उन्हें स्वीकारते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि कुत्ता भी हमें स्वीकारता है. इस उदाहरण से सीखनेवाली बात सिर्फ इतनी है कि इनसान भी अलग-अलग प्रकार के होंगे ही, लेकिन अगर उनमें से एक भी इनसान सामनेवाले को स्वीकारता है, तो दूसरा भी उसे स्वीकारने लगता है. 

बात पते कीः
-हर व्यक्ति के संस्कार, उसकी परवरिश अलग तरह से होती है. सही-गलत को लेकर उसकी परिभाषा अलग होती है. उस इनसान को वैसा ही स्वीकारें.

-कोई बच्चा हमें क्यों प्यारा लगता है? क्यों आकर्षित करता है? ऐसा इसलिए क्योंकि वह पूरी तरह स्वीकार करता है, बिना किसी दुर्भावना के.

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