सफ़लता ऐसे ही किसी के कदम नहीं चूमती. इसके लिए जिस जज्बे, जुनून और काबिलियत की जरूरत होती है, वह जानने के लिए कैप्टन जीआर गोपीनाथ की जिंदगी के बारे में जानना आवश्यक है. कैप्टन गोपी, जी हां उन्हें इसी नाम से ज्यादा जाना जाता है, ने ही भारत में लोगों को कम पैसों में हवाई यात्रा करायी. एयर डेक्कन की शुरुआत और फ़िर विजय माल्या के हाथों उसे बेचने के पहले भी कैप्टन गोपी ने कई ऐसे काम किये, जो उन्हें भीड़ से अलग करते हैं.जिंदगी का सफ़र58 साल के कैप्टन गोपी का कैरियर उपलब्धियों से भरा है और अब भी नयी ऊंचाइयों को छू रहा है. कर्नाटक के हसन के पास छोटे से शहर में पले-बढ़े गोपीनाथ सेना में अफ़सर बने.    
 
उन्होंने 1971 में बांग्लादेश मुक्ति अभियान में हिस्सा लिया. 27 साल की उम्र में सेना की नौकरी छोड़ दी. इसके बाद खेती करने लगे. जब खेती की तो उसमें भी झंडे गाड़ दिये. कई अवार्ड मिले. इसके बाद मोटरसाइकिल डीलर, होटल व्यवसायी, स्टॉक ब्रोकर व राजनेता बने. इन सबके बाद भारत में लो कॉस्ट एयरलाइंस के प्रणेता बने.स्टोरी टेलरकिस्सागोई की कला उन्हें अपने चाचा मशहूर साहित्यकार गुरुर रामास्वामी अयंगर से मिली. कहानी कहने की कला उनकी जीवनी में साफ़ झलकती है. जिस प्रकार उन्होंने अपने जीवन की कहानी बयान की है उसका प्रवाह देखते ही बनता है.संघर्ष की दास्तानविविधता भरे कैरियर में बदलाव लाना उनके लिए आसान नहीं रहा. खेती करने के अपने पहले अनुभव के बारे में वह लिखते हैं कि उन्होंने 20 एकड़ की जमीन खरीदी, जिसमें काफ़ी परिश्रम से आठ सौ नारियल के पौधे लगवाये. रातों-रात तूफ़ान में सारे पौधे नष्ट हो गये. पानी भरने के लिए खरीदे गये गधों के हास्यास्पद किस्से को भी उन्होंने बड़े रोचक अंदाज में बयान किया है. अपने सभी अवतार में गोपीनाथ सफ़ल रहे. सिर्फ़ राजनेता के रूप में वह सफ़ल नहीं हो सके. पर, लोग कहते हैं कि उन्होंने हार कर भी लोगों का दिल जीत लिया.एयर डेक्कन की शुरुआतएक बार वह अपनी यात्रा के दौरान फ़ोनिक्स एयरपोर्ट पर उतरे. उन्होंने देखा कि उस एयरपोर्ट से एक हजार उड़ानें संचालित होती थीं. करीब एक लाख लोग प्रतिदिन यात्रा करते थे. उन्हें इस बात पर यकीन नहीं हुआ कि रेगिस्तान के बीच में बने इस एयरपोर्ट से इतनी उड़ानों का संचालन होता है. उस वक्त भारत के 40 हवाई अड्डों को मिला कर भी इतनी उड़ानें संचालित नहीं होती थीं. उसी समय भारत के लोगों को सस्ती हवाई यात्रा मुहैया कराने की सोच ने जन्म लिया.कैसे मिला माल्या को मौकाजब एयर डेक्कन को पैसों की सख्त जरूरत थी, उस वक्त रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप (आर-एडीएजी) से 26 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का सौदा लगभग पक्का हो गया था. अमिताभ झुनझुनवाला, जो कि अनिल अंबानी के दाहिने हाथ समङो जाते हैं, ने गोपीनाथ से  15 दिनों का समय माांग, क्योंकि आर-एडीएजी स्पाइस जेट से भी सौदा कर रहा था और दोनों सौदों को एक समय में निबटाना चाहता था. इसी का फ़ायदा विजय माल्या को मिला. माल्या ने मोंटे कालरे से फ़ोन पर गोपीनाथ से कन्नड़ में बात की. गोपीनाथ इस शर्त पर मान गये कि दोपहर दो बजे तक उन्हें 150 करोड़ रुपये मिल जायें. शेष 410 करोड़ एक महीने के अंदर. इस डील में मात्र 45 मिनट लगे.सादा जीवनबंगलुरु में माल्या के बंगले के सामने ही गोपीनाथ एक फ्लैट में रहते थे. इस लिहाज से वे दोनों पड़ोसी थे. उन्होंने माल्या के बंगले के बगल में भी एक बंगला खरीदा था. इतनी ऊंचाइयां छूने के बाद भी गोपीनाथ के कदम जमीन पर ही हैं. वह आज भी दिल से एक स्मॉल टाउन ब्वॉय की तरह ही हैं. विजय माल्या और अंबानी से हुई मुलाकात के बारे में उन्होंने जो लिखा है, उससे यह जाहिर होता है कि वह कितने सादे और सरल हैं.डेक्कन के बादडेक्कन एयरलाइंस बेच देने के बाद गोपीनाथ नये व्यापार में लगे हैं. यह है एयर कागरे लॉजिस्टिक्स. डेक्कन एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स नाम की कंपनी के माध्यम से वह नये व्यवसाय में हैं और यह कहना काफ़ी मुश्किल है कि यह उनका ओखरी व्यापार है.कोट-अनकोटबिजनेस एंड मैनेजमेंट के लेखक प्रो लेनरी मिटजबर्ग ने गोपीनाथ के बारे में कहा है  पारंपरिक किसानों का शोषण होता है, पर ये संभावनाएं तलाशते हैं. वह एक्सपेरिमेंट बोते हैं, कल्पना से उसे सींचते हैं और विचार की फ़सल काटते हैं.
 
 
सिंपली फ्लाई  ए डेक्कन ओडिसी
भारत में लो कॉस्ट एयरलाइंस की शुरुआत करनेवाले शख्स जीआर गोपीनाथ की ऑटोबायोग्राफ़ी सिंपली फ्लाई  ए डेक्कन ओडिशी में ऐसे कई प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगे, जो आम जिंदगी में युवाओं के मन में उठते हैं. इसे पढ़ कर उन्हें प्रेरणा जरूर मिलेगी. कैसे पास में एक करोड़ रुपये होने पर 12000 करोड़ के जहाज का ऑर्डर दे दिया, कैसे 55 मिलियन डॉलर के एयरक्राफ्ट की कीमत को कम कर 28.5 मिलियन डॉलर करा दिया और कैसे बिना किसी पूर्व कार्यक्रम के मुख्यमंत्री से मुलाकात कर ली जैसे सवालों के जवाब इस किताब में मिल जायेंगे. 399 पृष्ठों की इस पुस्तक की कीमत 499 रुपये है. इसका प्रकाशन हार्पर कोलिंस ने किया है. कुछ दिनों पहले ही इसका विमोचन इंफ़ोसिस के चेयरमैन एनआर नारायणमूर्ति ने किया था. |