नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक फ़ैसले में कहा है कि दहेज से जुड़े मामलों में यदि किसी महिला की मौत हो जाती है, तो केवल दुर्लभ मामलों में ही दोषी को उम्रकैद की सजा दी जानी चाहिए. इस तरह के हर मामले में उम्रकैद की सजा देना उचित नहीं है.  जस्टिस पी सदाशिवम और एचएस दत्तू की बेंच ने जीवी सिद्धरमेश की उम्रकैद की सजा कम करके 10 साल करते हए यह फ़ैसला सुनाया. सिद्धरमेश को कर्नाटक की एक निचली अदालत ने उसकी पत्नी की मौत के लिए दोषी ठहराया था. भारतीय दंड संहिता की धारा 304 बी के तहत दहेज से जुड़़े मौत के मामलों में न्यूनतम सजा सात साल की कैद है, जबकि अधिकतम उम्रकैद है. ‘हेमचंद्र बनाम हरियाणा राज्य‘ के केस में तीन जजों की बेंच के फ़ैसले का उदाहरण देते हए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 304 बी केवल दहेज हत्या का अनुमान लगाती है और इसके अनुसार कम-से-कम सात साल और अधिकतम उम्रकैद की सजा सुनायी सकती है. 1997 में सिद्धरमेश से ब्याही गयी ऊषा ने शादी के एक महीने के भीतर ही अपने घर में फ़ांसी लगा ली थी. दहेज में और 50,000 रुपये की मांग के कारण ऊषा को मानसिक तौर पर उसके पति ने प्रताड़ित किया था, जिसकी वजह से उसने यह कदम उठाया. |