बोधगया में बार-बार ओशो की यह पंक्तियां जीवंत हो रही हैं. ढाई दशक पहले पश्चिम के देशों में ओशो को बुद्ध के प्रति जो आदर दिखा था, वह साल-दर-साल बढ़ता गया है. कह सकते हैं कि आज पश्चिम के देशों में बुद्ध के प्रति आदर का दायरा व्यापक हुआ है. विचारकों, चिंतकों, वैज्ञानिकों के साथ-साथ पश्चिम के आमलोग भी आदर के दायरे में आये हैं. कम-से-कम बोधगया में इस बार उमड़ी भीड़ का एक संदेश यह भी है. कारण हजारों की भीड़ में पश्चिम से आये सैकड़ों चेहरे शामिल हैं. फ्रांस की एनी लॉररे, पियरे लेफ़ेव्रे, डेनियले, पॉल सिसिलिया, इंगलैंड के जोसेफ़ जेक, सैमयूएल, थेरेसा और अमेरिका के डायलन तक ध्यान में दिखते हैं. मौन दिखते हैं. बात करने की कोशिश पर मुस्कुराते हैं. प्रणाम की मुद्रा में दोनों हाथ जोड़ते हैं. इनलोगों की भाषा को समझना जितना कठिन है, उनके चेहरे के भाव को महसूस करना उतना ही आसान. फ्रांस की एनी लॉररे पहली बार बोधगया आयी हैं. 32 वर्षीया एनी बात नहीं करना चाहतीं. दोनों हाथ जोड़ती हैं और कहती हैं-अब बोलना नहीं, अब सुनना नहीं, चुप रहना चाहती हूं. मुङो शांति से रहने दें. मुझसे कुछ मत पूछें. मैं कुछ नहीं बोलना चाहती. एनी ने अपना फ़ोटो लेने तक से मना कर दिया. एनी बोलना-सुनना क्यों नहीं चाहतीं? क्यों चुप रहना चाहती हैं? अशांति क्यों है? क्या है? इन सवालों का जवाब नहीं मिल पाता है. वह आगे बढ़ जाती हैं. इतना जरूर मालूम चला कि एनी फ्रांस के एक समृद्ध घराने की बेटी हैं.
  300 करोड़ से अधिक का व्यवसाय विरासत में मिला. सात-आठ साल से एनी पूरी सक्रियता से बिजनेस संभाल रही हैं. एनी को ‘ बहुत कुछ’ मिला है, मगर ‘सब कुछ’ नहीं. और शायद इसी ‘सब कुछ’ को समझने व पाने की इच्छा एनी को बोधगया लायी है. एनी नहीं बोलीं, मगर स्विटजरलैंड के 64 वर्षीय यूली मिनडर बोलते हैं. प्रेम बांटो, प्रेम पाओगे, को जीते मिनडर स्थानीय बच्चों के साथ दिखते हैं. न बच्चों की भाषा मिनडर समझ पा रहे हैं और न ही मिनडर की भाषा बच्चे. फ़िर भी बच्चे उनके साथ हैं. एकदम सहज-सरल अंगरेजी में मिनडर कहते हैं  ‘लव इज बियोंड लैंग्वेज (भाषा से परे है प्रेम).’ स्विटजरलैंड के एक कॉलेज में मिनडर बायोलॉजी के प्रोफ़ेसर रहे. बायोलॉजिस्ट के साथ-साथ साइकोलॉजिस्ट भी. स्विस गवर्नमेंट में ऊंचे पद पर नौकरी भी की. होश संभाला, तो पाया कि परिवार से बहुत कुछ मिला है. क्रिश्चियन धर्म भी. साइंस के स्टूडेंट मिनडर को स्कूल के दिनों से ही जीवन व धर्म से जुड़े कुछ सवाल बेचैन करते रहे. सवाल करते, तो कहा जाता कि विश्वास करो, सवाल नहीं. मिनडर ने विभिन्न धर्मो के बारे में पढ़ना-जानना शुरू किया. इसी दौरान उनका सामना बुद्धिज्म से हुआ. बुद्ध दर्शन पढ़ते हुए जहां रुक गये, वह लाइन थी-‘ खुद से सवाल करो. सवाल नहीं करोगे, तो जवाब कैसे मिलेगा?’ मिनडर कहते हैं  साइंस का स्टूडेंट रहा. साइंस भी सवाल करने को कहता है और बुद्धिज्म भी. मिनडर का बौद्ध धर्म की ओर झुकाव हुआ. बौद्ध साहित्य का गहन अध्ययन किया. मिनडर कहते हैं  बुद्धिज्म आपको अंदर की यात्रा के लिए तैयार कराता है. बौद्ध दर्शन से यह जाना कि खुशियां आपके अंदर हैं. स्विटजरलैंड काफ़ी अमीर है. वहां के लोगों के पास काफ़ी पैसे हैं, मगर खुशी नहीं है. शांति नहीं है. |