अनुराग कश्यप, बोधगया से लौट कर
 
भगवान बुद्ध की ज्ञानभूमि बोधगया को लेकर पूरी दुनिया में बिहार की ख्याति रही है. इधर बीते अगस्त महीने से दुनिया के कोने-कोने से लोग बोधगया पहुंचे हैं. अरसे बाद इतनी भीड़ दिखी. पूजा-प्रार्थनाओं का दौर चला. वषरें बाद दलाई लामा तक बोधगया आये. ऐसे में बोधगया पहुंचे प्रभात खबर के विशेष संवाददाता अनुराग कश्यप ने देखा कि कैसे बिहार के बदले माहौल में दुनिया के विभिन्न हिस्सों से लोग बोधगया पहुंचे? साथ ही कैसे दुनिया में बौद्ध दर्शन के प्रति आकर्षण बढ़ा है? पढ़िए रिपोर्ट श्रंखला में.
 
 
बोधगया घूमने के लिए दो दिन का समय पर्याप्त है. अगर आप एक रात वहां रुकते हैं, तो एक दिन का समय भी पर्याप्त है. खराब कानून व्यवस्था के कारण बिहार में रात में घूमने की सलाह नहीं दी जाती है.  इंटरनेट पर बोधगया-विकिपीडिया
 
 
100 से ज्यादा लोग हैं, फ़िर भी ट्रेन की बोगी में खामोशी है. मुकम्मल इंतजाम के बावजूद ठंड की कड़ाकेदार ताकत का एहसास गहरा है. सर से पांव तक पूरा शरीर गरम कपड़ों में कैद है. अगल-बगल में मुट्ठी बांधे लोग बैठे हैं. ठंड के सामने समर्पण भाव के साथ. पटरी पर कुहरे की गश्त के बीच 1.29 घंटे देर से ट्रेन जब गया स्टेशन पहुंची है, तब रात के 10.35 बज रहे हैं. प्लेटफ़ॉर्म से बाहर निकलते ही ऑटो..ऑटो..ऑटो की कई आवाजें एक साथ कान में समाती हैं. बोधगया जाना है. ‘‘एकदम चलम भईया.बाकि.येतना लगबे करतऊ. बोधगया लिये 18-19 किलोमीटर जाये पड़तई. आ बड़ी ठंडे हई.’’ रात में इतनी दूर जाना ठीक होगा? ‘‘अरे.ना.ना भईया, डरे वाला कोई बात ना हई. अब पहिलेवाला बात थोड़े रहलई. दिन-रात में कौनो अंतर ना हई. खाली ठंडे बेसी हई. ना त औरो कुछो बाते ना हई.’’ यह दीपक कुमार हैं, जिनकी ऑटो गाड़ी अगले पांच मिनट में बोधगया की ओर चल पड़ी है. गया स्टेशन के बाहर चहल-पहल है, मगर पूरा शहर कुहासे की चादर ओढ़े सो चुका है. कुहरे व सन्नाटे के आगोश में समां चुकी गलियों से गुजरते हुए बोधगया जानेवाली मुख्य सड़क पर कई और हमसफ़र ऑटो दिखते हैं. दीपक कहते हैं ‘‘दिन-रात भोटिया लोग आ रहले हई. डेढ़-दू महीने से सब ऑटोवाला सवारी ढोते-ढोते अघा गइले हई.’’ दीपक जानकारी देते हैं-अक्तूबर, 2009 से देश-दुनिया से बौद्ध भक्तों-श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला चल रहा है. ऑटोवालों को खूब सवारी मिल रही है. खूब कमाई हो रही है. कई ऑटो मालिक तो अलग-अलग ड्राइवर रख कर दो-दो शिफ्ट गाड़ी चलवा रहे हैं. दर्जनों नये ऑटो निकल गये हैं. दीपक पिछले 14 वषरें से ऑटो चला रहे हैं. हर साल इस मौसम में और फ़िर वैशाख (अप्रैल-मई) में बुद्ध जयंती के मौके पर देश-दुनिया के विभिन्न हिस्सों से बौद्ध भक्त आते रहे हैं, मगर इस बार जैसी भीड़ दीपक ने पहले नहीं देखी.बातों के बीच में ध्यान जाता है- मोबाइल की घड़ी रात के 12 बजे की ओर बढ़ रही है. नौ मिनट शेष हैं. ऑटो गाड़ी बोधगया में प्रवेश करती है. चारों तरफ़ कुहरे का साम्राज्य और उसमें छुपा सन्नाटा है. कुहरे से संघर्ष में हार कर दीपों की तरह टिमटिमाती रोड लाइटें हैं. सवाल ही नहीं उठता कि इतनी रात में और इस शीतलहरी में कोई दिखेगा. हर सेकेंड के साथ महाबोधि मंदिर की दूरी कम हो रही है. फ़िर अगले कुछ मिनटों में जो कुछ दिखता है, उस पर एकबारगी आंखों को भरोसा नहीं होता. नजरें कई जत्थों में घूमते-टहलते लोगों पर पड़ती हैं. ऑटो से महाबोधि मंदिर के सामने उतरते ही आसपास खुले होटल दिखते हैं. रेस्टोरेंट से लेकर कॉफ़ी शॉप तक में लोग हैं. चाय की छोटी दुकानों में चुस्की का स्वर भी सुनायी पड़ता है. अलाव जला कर बैठे लोग भी दिखते हैं. लेकिन बोधगया के युवा व्यवसायी मुकेश सिंह के लिए यह सब नया नहीं है.मुकेश बताते हैं ‘‘दो महीने से ऐसा ही नजारा है. बोधगया 24 घंटे जगा रहता है. देश-दुनिया के कोने-कोने से आनेवाले मेहमानों के स्वागत में.’’ मुकेश की मानें, तो सर्द रात की पहरेदारी में मेहमाननवाजी के ऐसे दृश्य बोधगया के अलावा शायद ही कहीं और दिखे. बीते अगस्त महीने से ही श्रीलंका, नेपाल, भूटान, म्यांमार, तिब्बत, चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, थाइलैंड, सिंगापुर, ताइवान, वियतनाम, रूस, अमेरिका, इंगलैंड, फ्रांस, स्विटजरलैंड, बैंकॉक, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के कई देशों से बौद्ध भक्तों के आने का सिलसिला जारी है. गया-बोधगया के बीच सफ़र में गुजरी डेढ़ घंटे की सर्द रात के बाद पहली नजर का जो बोधगया सामने है, वह कह रहा है  इंटरनेट पर बोधगया-विकिपीडिया में दी गयी इस जानकारी को डिलिट-ऐडट कर दो कि खराब कानून व्यवस्था के कारण बिहार में रात में घूमने की सलाह नहीं दी जाती है. |