वैश्विक अर्थव्यवस्था पिछले दशक से लंगड़ाती हुई बाहर निकल चुकी है और नये साल 2010 में प्रवेश कर रही है, तब इसके वैश्विक वृद्धि में अगला उत्प्रेरक क्या होगा? अब लगता यही है कि ओर्टफ़िसियल इंटेलीजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमता का असर दिखेगा और यह चीन व भारत के उभार से कम महत्वपूर्ण घटना नहीं होगी. इस मामले में मेरी समझ एक खेल शतरंज में आये बदलावों के आधार पर बनी है. यह वह खेल है, जो कभी मैं पेशवर स्तर पर खेलता था. वैसे कुछ खास कंप्यूटर न सिर्फ़ सिलिकॉन क्षेत्र में क्रांति के द्योतक हैं, बल्कि लोगों के मिजाज भांपने का एक औजार भी कि मानव किस कदर इससे अनुकूलित होते हैं. इस मामले को समझने में इतिहास की एक घटना सहायता कर सकती है. 1996 और 1997 में वर्ल्ड शतरंज चैंपियन गैरी कास्पोरोव ने आइबीएम कंप्यूटर डीप ब्लू के खिलाफ़ कई मैच खेले. उस समय कास्पोरोव वर्ल्ड शतरंज पर छाये हुए थे, जैसे हाल तक टाइगर वुड्स गोल्फ़ पर छाये थे. 1996 के मैच में डीप ब्लू ने पहले ही गेम में इस चैंपियन को हरा कर सकते में डाल दिया. लेकिन कास्पोरोव ने जल्द ही अपने लाभ के लिए दीर्घकालिक रणनीति के तहत कंप्यूटर की कमजोरियों का पता लगा लिया.   दुर्भाग्यवश आत्मविश्वास से भरे कास्पोरोव ने 1997 में दोबारा हुए मैचों में डीप ब्लू को गंभीरता से नहीं लिया. डीप ब्लू ने मैच को 3.5 के मुकाबले 3.5 जीत कर गैरी को सदमा दे दिया. बहुत से कमेंटेटरों ने डीप ब्लू की जीत को 20वीं सदी की बहुत महत्वपूर्ण घटना के रूप में अंकित किया है. संभवत: कास्पोरोव ने 24 मैचों के टूर्नामेंट को जीत लिया होता, लेकिन अगले कुछ सालों में जैसे प्राय: मनुष्यों ने कंप्यूटरों से सीखा है, उससे कहीं अधिक गति से कंप्यूटरों का तीव्र गति से विकास हुआ है.   अब तो अधिक शक्तिशाली प्रोसेसरों के साथ सिलिकॉन चेस प्लेयर्स ने आगे के समय को पढ़ते हुए खुद की क्षमता का विकास किया, जिससे अल्पकालीन कुशल गणना और दीर्घकालीन रणनीति की विभाजक रेखा मंद पड़ गयी है. उसी समय कंप्यूटर प्रोग्राम ने ग्रैंड मास्टरों के बीच खेले गये अधिकतम खेल डाटा पर महारत हासिल कर ली कि मानव खेलों के परिणामों का प्रयोग करने में सफ़ल होने की बुनियादी गुत्थियां क्या हैं. जल्द यह स्पष्ट हो गया कि प्राय: अच्छे दिमाग के शतरंज खिलाड़ी को किसी मैच में ड्रा से बेहतर करने की बहुत कम गुंजाइश रही.   आज कल शतरंज के प्रोग्राम इतने अच्छे हो गये हैं कि ग्रैंड मास्टरों को भी उनकी चालों को समझने के लिए संघर्ष करना पड़ता है. शतरंज की प्रतियोगिताओं में प्राय: बड़े खिलाड़ियों का एक विचार देखने का होता. जैसे कि ‘मेरा सिलिकॉन दोस्त कहता है कि मुङो रानी के बदले अपने राजा को चलना चाहिए था. लेकिन मैं शांति से सोचता हूं कि मैंने इंसानों की सबसे बेहतर चाल चली है.’    मामला और गड़बड़ाता गया है. कई ऐसे कंप्यूटर प्रोग्राम भी उपलब्ध हैं, जो बड़े ग्रैंडमास्टरों के नकलची प्रोग्राम जैसे हो सकते हैं. वास्तव में शतरंज के प्रोग्राम अब ब्रिटिश गणितज्ञ एलन टुरिंग के कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अंतिम परीक्षण के समय पर दिये गये मत के बहुत करीब हैं : क्या मनुष्य मशीन की ओर तब्दील हो रहा है या वह मनुष्य नहीं है?   मुङो नहीं लगता कि ऐसा होता है. विडबंना है कि कंप्यूटर संबंधी बेईमानी शतरंज के खेलों में व्यापक रूप से फ़ैल रही है. उपकरण का मुख्य नेटवर्क अन्य दूसरे कंप्यूटर से जुड़ा होता है. केवल एक मशीन ही दृढ़तापूर्वक बता सकता है कि इस वर्तमान स्थिति में दूसरा कंप्यूटर क्या करेगा. यदि टुरिंग आज जीवित होते तो उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को कंप्यूटर की अयोग्यता के रूप में परिभाषित किया होता. वह कहते कि मुङो संदेह है कि दूसरा मशीन मनुष्य है.  इसलिए क्या इसके आने से शतरंज के खिलाड़ी बेकार हो गये हैं. स्पष्ट रूप से कहे तो उत्तर है, अभी नहीं. सच यह है कि शतरंज आज पिछले कुछ दशकों से हर स्तर पर लोकप्रिय व सफ़ल है. शतरंज इंटरनेट के माध्यम से अच्छी तरह फ़ैला है और इसके प्रेमी कहीं से इसे देख-खेल सकते हैं. तकनीक भी शतरंज को विश्व स्तर पर फ़ैलाने में सहायक हुई है. भारत के विश्वनाथन आनंद अब पहले ऐशयाई वर्ल्ड चैपिंयन है और हैंडसम दिखनेवाले नार्वे के युवा मैग्नस कार्लसन रॉक स्टार सरीखे हो गये हैं. अब मनुष्य व मशीन साथ-साथ रहना सीख गये हैं.   वास्तव में यह विशाल संभावनाओं का एक छोटा सा हिस्सा है, जिसे हम स्वीकार कर सकते हैं. पचास सालों में कंप्यूटर प्रत्येक चीज टैक्सी चलाने से लेकर रोज की आवश्यकताओं का काम बखूबी कर सकते हैं. जल्द ही ओर्टफ़िसियल इंटेलीजेंस के क्रांतिकारी परिणाम आयेंगे. इससे गरीब विकासशील देशों में भी बड़े पैमाने पर उच्च स्तर के विश्वविद्यालय शिक्षा पद्धति स्थापित होगी. यह बहुत व्यापक क्षेत्र है. ओर्टफ़िसियल इंटेलीजेंस का प्रत्येक जगह निर्णायक उपयोग है. इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की निगरानी से लेकर घरों में बिजली ओद की व्यवस्था तक, इसके तहत आने लगे हैं. कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर शक-सुबहा के दिन लद गये. वित्त संकट से निकलने के बाद अगले दशक में इसके रहते किसी ओर्थक संकट की उम्मीद करना सही नहीं होगा. व्यापार, तकनीक में नये बदलाव का वाहक कृत्रिम बुद्धिमत्ता होने जा रही है. और यह साफ़ है कि इसका असर समाज पर भी पड़ेगा. भविष्य में इस तरह के बदलावों के लिए तैयार रहने की जरूरत है.
 
(लेखक हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में इकोनोमिक्स व पब्लिक पॉलिसी के प्रोफ़ेसर हैं)
कॉपीराइट : प्रोजेक्ट सिंडिकेट-2010 |