चुनाव और पाकिस्तान का भविष्य

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 16 Jul 2013 1:36 PM

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।।एमजे अकबर।।(वरिष्ष्ठ पत्रकार हैं)पाकिस्तान में चुनाव के नतीजे से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह तथ्य है कि वहां चुनाव हो रहे हैं. ऐसे सिद्धांतकारों की कोई कमी नहीं, जो भूत और वर्तमान के बीच तुलना करने से खुद को रोक न पाएं. मसलन, यह संभव है कि लोगों को इस चुनाव में 1970 और 1971 का […]

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।।एमजे अकबर।।
(वरिष्ष्ठ पत्रकार हैं)
पाकिस्तान में चुनाव के नतीजे से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह तथ्य है कि वहां चुनाव हो रहे हैं. ऐसे सिद्धांतकारों की कोई कमी नहीं, जो भूत और वर्तमान के बीच तुलना करने से खुद को रोक न पाएं. मसलन, यह संभव है कि लोगों को इस चुनाव में 1970 और 1971 का धुंधला सा भूत दिखाई दे. भले ही उल्टे आईने में. एक नये पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान का उदय हो रहा है. सिंध, बलूचिस्तान और खैबर-पख्तूनख्वा फूट की ओर बढ़ रहे हैं और पंजाब अपनी केंद्रीय भूमिका में बना हुआ है. यानी एक ऐसा परिदृश्य उभर रहा है, जिसमें 1947 में बना और 1971 में दो टुकड़ों में बंट गया पाकिस्तान, 21वीं सदी ने जब पहली अंगड़ाई ही ली है, सिर्फ पंजाब तक सीमित किया जा रहा है.

अगर सांप्रदायिक भावनाओं और भूगोल के बीच एक सह-संबंध स्थापित हो जाये, तो चुनाव दरारों को जन्म देने या उसे गहरा करने का काम कर सकता है. बांग्लादेश की मुक्ति का आंदोलन अपने निर्णायक चरण में तब पहुंचा, जब आम चुनावों ने यह साबित कर दिया कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान राजनीतिक रूप से बंटे हुए हैं. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के संस्थापक जुल्फिकार अली भुट्टो ने आम चुनावों के परिणाम आने के बाद काफी जोर-शोर से यह दलील दी कि मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग को पश्चिमी पाकिस्तान पर शासन करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, क्योंकि उनका जनादेश निश्चित तौर पर सिर्फ पूर्वी हिस्से की बदौलत आया है. अवामी लीग को शासन करने का अंक-गणितीय बहुमत तो था, लेकिन राजनीतिक बहुमत नहीं था. भुट्टो सही थे. लेकिन उसी तर्क से उनकी पीपीपी का बांग्लादेश के ऊपर कोई दावा नहीं था, क्योंकि उनकी पार्टी तो पूर्व में मुकाबले में ही नहीं थी.

लेकिन, दो समकालीन तथ्य विखंडन को बिल्कुल नामुमकिन बना देते हैं. सेना के तौर पर पाकिस्तान के पास एक मजबूत राष्ट्रवादी संस्था है. 1971 में भी बांग्लादेश का जन्म पाकिस्तानी सेना को भारत के हाथों मिली शिकस्त के बगैर नहीं हुआ होता. पूर्व और पश्चिम को मिल कर कोई दूसरा समाधान खोजना पड़ता, लेकिन यह दूसरी कहानी है. दूसरी बात, तहरीक-ए-तालिबान और इसके सहयोगी पाकिस्तान के भूगोल के लिए किसी किस्म का खतरा पैदा नहीं करते. वे उस राज्य की मौजूदा विचारधारा को चुनौती दे रहे हैं, जिसे वे एक चलताऊ समझौता मानते हैं. वे एक कट्टरपंथी पाकिस्तान चाहते हैं, न कि एक बंटा हुआ पाकिस्तान. उनका विश्वास है कि शरिया से निर्देशित होनेवाला सुन्नी इसलाम उप-राष्ट्रवाद पर अंकुश लगा सकता है. वे बलूचियों और पठानों को खदेड़ना नहीं चाहते हैं.

ताबिलान ने दो सांप्रदायिक पार्टियों के खिलाफ सशस्त्र कार्रवाई शुरू की है. एक उत्तरी भारत के शरणार्थियों के मोर्चे- एमक्यूएम और दूसरे फ्रंटियर की अवामी नेशनल पार्टी के खिलाफ. इसका तीसरा शत्रु पीपीपी है, जो चुनाव के बाद सिंध तक सिमट कर रह जा सकती है. तालिबान इन पार्टियों को सिर्फ चुनावों में नहीं हराना चाहता, वह इनके वजूद का ही सफाया कर देना चाहता है. अप्रैल महीने में सौ से ज्यादा लोग मारे गये और तीन सौ से ज्यादा जख्मी हुए. चुनाव प्रचार के मौसम के अंत में पीपीपी के भूतपूर्व प्रधानमंत्री यूसुफरजा गिलानी के बेटे का मुल्तान में अपहरण कर लिया गया. जैसा कि चर्चित लेखक और पत्रकार अहमद राशिद ने कहा, इस बार ध्रुवीकरण, हत्याएं अभूतपूर्व स्तर पर रहीं.
एक ऐसी धरती पर जहां शांति अपने आप में एक खबर है, शांति का कोई बड़ा द्वीप निश्चित तौर पर सवाल पैदा करेगा. आश्चर्यजनक है और शायद तार्किक भी कि पंजाब में हिंसा की मात्र काफी कम है. कई लोगों का मानना है कि इसके पीछे दो प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों- नवाज शरीफ के मुसलिम लीग और इमरान खान की तहरीक-ए-इंसाफ के बीच आपसी समझौता है. अगर यह सही भी है, तो यह कहानी का छोटा सा हिस्सा भर है.

तालिबान और इसके मित्र हमारी सोच से ज्यादा होशियार हैं. यह एक तरह से सुनियोजित फैसला है. तालिबानियों को लगता है कि वे बाहरी हिस्सों पर नियंत्रण कर सकते हैं. इससे उन्हें पाकिस्तान पर नियंत्रण करने के आखिरी चरण को लड़ने के लिए एक बड़ा ‘बेस’ मिल जायेगा, जो पंजाब में लड़ा जायेगा. न ही नवाज, न इमरान तालिबान के सहयोगी हैं. इस चुनाव में लोकतंत्रवादियों- इमरान तथा नवाज और तालिबान एक दूसरे का इस्तेमाल मोहरे के तौर पर कर रहे हैं. उग्रवादियों ने पाकिस्तान की लोकतांत्रिक पार्टियों की एक बुनियादी कमजोरी का इस्तेमाल अपनी अपील को धारदार बनाने के लिए किया है. यह है सामंतवाद के सामने इनका घुटने टेकना. पाकिस्तान में कभी भी वास्तविक भूमि-सुधार नहीं हो सका. समाजवाद के साथ नैन-मटक्का करनेवाले भुट्टो ने इस दिशा में कोशिश की, असफल हुए और आखिरकार इस विचार को त्याग दिया. इसलाम के साथ भूमि किसानों के लिए एक बड़ा नारा है.

पाकिस्तान से आनेवाला सबसे डरावना परिणाम त्रिशंकु संसद होगा. यह सेना की सबसे खतरनाक इच्छाओं को प्रोत्साहित करेगा और उग्रवादियों में यह भावना भरेगा कि उनका बंदूकों से चलनेवाला धर्म का शासन ही देश के लिए आखिरी उम्मीद है. इसलिए जरूरी है कि जो भी जीते, अच्छे से जीते.

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